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पूर्णता का महासागर है ‘दु:ख-सुख’

शशि दीपक कपूर
मुंबई (महाराष्ट्र)
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‘अरे! मन समझ-समझ पग धरियो, अरे मन इस जग में नाहिं अपना कोई, परछाईं सो डरिए…।’ राग असावरी पर आधारित यह बंदिश दुखी मन को समझाने के लिए आशा की किरण के समान है।
संसारिक चिंतन का विषय है एक शब्द ‘दु:ख’ । क्यों है ? प्रश्न सबके मन को विचलित कर देता है। गुरु नानक देव जी भी यही कह गए, ‘नानक दुखिया सब संसार।’ महापुरुष व ऋषि-मुनि भी ‘दु:ख’ से अपने जीवन को न बचा सके। किसी की दृष्टि में दु:ख श्राप जनित है और किसी की नजर में जन्मों के कर्म फल हैं। यदि सुख-दु:ख मानवीय गुणों को विकसित करने का साधन माना जाए तो नैतिक मूल्यों के अस्तित्व का निर्धारण किया जा सकता है। और अगर ब्रह्म स्वरूप में अमृत-आनंद का आवाहन करने पर सृष्टि के अनन्त रुप ‘सत्यं शिवं सुंदरम्’ का प्रकाश मानव-आत्मा को शांत व अद्वैत बना देता है। चंद्र रुपी मन अपनी चंचलता को कदापि तज नहीं सकता और अभिव्यक्ति के लिए माध्यम खोजने लगता है और आत्मा मन की चंचलता से प्रभावित होकर वास्तविकता के साथ अनुभूति सामंजस्य से सत्यता प्रकट करने लगती है। यानि अपूर्ण को पूर्ण करने जुट जाती है।
अपूर्ण संसार वही है, जो अदृश्य है जो मन-मस्तिष्क व आत्मा में सदैव संघर्षशील रहता है। जब विचार विलोड़न से यही भाव-संवेदनाएं शब्द अर्थ सहित अभिव्यक्ति प्राप्त कर लेती हैं तो पूर्ण हो ‘ब्रह्मानंद या रसास्वादन आनंद’ में परिवर्तित हो जाती है।
प्रकृति की अपार सम्पदा से मस्तिष्क व आत्मा दोनों ही एकाकार करने पर आनंद व आकर्षण शक्ति प्राप्त करते हैं। सूर्य या चंद्र किरणों का महत्व अन्त:करण को नि:शब्द व निस्तरंग बना लुभाने में सदैव सफल रहता है। ठीक ऐसे ही मानव अपने कर्म-क्षेत्र से जो उपजाता है, वो ही सुख-दु:ख की उत्पत्ति का कारण होता है। सुख-दु:ख दोनों को आनंद अमृत मानने से जीवन चल व अचल की परिधि में परिक्रमा करता रहता है। मात्र संतोष, धन व निरंतर प्रयत्नशील रहने से ही दु:ख को मानव अपनी आत्मा से दूर रख सकता है। यदा-कदा परिस्थितियों में दु:ख मानव को नई दिशा व संघर्ष करने का मार्ग प्रशस्त भी करता है, साथ ही अपने-पराए की पहचान और नव मार्गदर्शन का दिशा-निर्देशन भी करता है।
मनुष्य दु:ख-धन देने में सक्षम है। अत: यह ईश्वर कृत कदापि नहीं है। दु:ख के कारण ही ईश्वर व प्रकृति के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा ने अनेक महापुरुषों को अवतरित किया है। प्रकृति ने सुख-दु:ख दोनों को समान अनुभूति दी है। कभी-कभार मनुष्य अति दुख में व्यथित हो अश्रु बहाता है, और अक्सर अति सुखद स्थिति में भी आँसू स्वत: बहने लगते हैं। यह मान लीजिए कि, दु:ख-सुख दोनों एक समान है, दोनों में प्रकाश है, दोनों में ताप है, दोनों ही गतिशील हैं एवं यही सौंदर्य ईश्वर का मूर्त स्वरुप है।
अर्थात् मनुष्य को दु:ख-सुख के परम आनंद का साक्षात् ईश्वर दर्शन है। जिस मनुष्य ने दु:ख का सामना नहीं किया, उस मनुष्य का जीवन अपूर्ण है। और जिस मनुष्य ने मात्र दु:ख ही दु:ख का सामना किया है, वह मनुष्य भी अपूर्ण है। अत:, मनुष्य के जीवन की पूर्णता का महासागर है ‘दु:ख-सुख।’ अज्ञेय जी की पंक्तियों में-
“दुख सबको मांजता है
और
चाहे स्वयं सबको
मुक्ति देना वह न जाने
किन्तु,
जिनको मांजता है
उन्हें यह सीख देता है,
कि
‘सबको मुक्त रखे।’

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