कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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पृथ्वी के गर्भ से आईं माँ जानकी,
जनक जी की दुलारी थीं माँ जानकी।
कितनी प्यारी, जनक-दुलारी माँ जानकी!
एक दिन राम मिले, फूल तोड़ते उपवन में,
नैन से नैना यूँ लड़े, जैसे फूलों के बाग में
सभा जब लगी, राम निहारें सिया को, सिया निहारें राम को,
सभा में सब निहारें सिया-जानकी के रूप को
एक धनुष को तोड़ के राम सिया के हो गए,
प्रेम ऐसा था कि राम-जानकी दोनों प्रेममय हो गए।
काल ने करवट ली, राम संग चल दीं वन को,
जब हरण हो गईं सीता जानकी
टूटकर राम विनती करते रहे वृक्षों से,
पेड़-पौधे, पंछी, डाल-डाल से —
“सिया किधर गई ?” राम पूछते रहे वन में
सीता की याद में राम रोते रहे वन में,
‘सीता-सीता’ बोलते भटकते रहे जंगलों में
फूल बिछ गए राहों में, पेड़ भी रोने लगे जंगलों में।
मायावी रावण छल गया,
भोली सिया को लंका ले गया
सोने-सा महल भी तुच्छ लगा सिया जानकी को,
सिया जैसी देवी को रावण चला था मोहने
योगिनी का रूप धरा, पर बात न मानी दुष्ट की।
मर्यादा पुरुषोत्तम थे राम जी,
पर सिया ने सब मर्यादा निभाई जग में
तिनके का सहारा लेकर दुश्मन का घमंड तोड़ डाला,
‘राम-राम’ रटती रहीं सिया जानकी
सदैव जीवन बिताया सादगी से जानकी।
काल का चक्र, समय का प्रहार — सिया को भी न छोड़ा,
राजमहल छोड़ जंगल-जंगल फिरती रहीं
मर्यादाओं में जीती रहीं सिया जानकी,
बार-बार अग्नि-परीक्षा हुई, दुनिया ने न माना
मर्यादा की मूर्ति, पवित्र जानकी को।
जन ने समझा नहीं, मौन खड़े रह गए श्री राम जी।
‘राम-राम’ रटते बीता जीवन जानकी का,
सिया हर पल राम की थीं, हर युग में राम की रहेंगी जानकी॥