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पोरस

नताशा गिरी  ‘शिखा’ 
मुंबई(महाराष्ट्र)
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जो जीता वही सिकन्दर
इस मिथ्या को कब तक तुम गाओगे,
पोरस की विजयगीत को
इतिहास के पन्नों में कब तक यूँ छिपाओगे।

सिन्धु नदी और झेलम ने
फिर पोरस को पुकारा है,
उन इतिहासकारों की चाटुकारिकता को
देखो कितना धिक्कारा है।

मुद्राराक्षस के पन्नों को कभी तुम टटोल लो,
मेसोडोनिया के कुवर का फिर सही तुम मोल लो।

भारत की धरती पर जब
निशस्त्र सिकन्दर पड़ा हुआ था,
आर्य धर्म का मान रखे
पोरस छाती ताने वहाँ अड़ा हुआ था।

राजपूत के मान को तब उसने बढ़ाया था,
निशस्त्र धरती पे पड़े हुए
सिकन्दर को अपना हाथ दे उठाया था।

भारत के जनहित में वो निर्णय लेना मुश्किल था,
सन्धि कर सिकन्दर से
भारत की धरा से उल्टा पग लौटाया था,
तब जाकर पोरस निर्णायक कहलाया थाll

परिचय-नताशा गिरी का साहित्यिक उपनाम ‘शिखा’ है। १५ अगस्त १९८६ को ज्ञानपुर भदोही(उत्तर प्रदेश)में जन्मीं नताशा गिरी का वर्तमान में नालासोपारा पश्चिम,पालघर(मुंबई)में स्थाई बसेरा है। हिन्दी-अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाली महाराष्ट्र राज्य वासी शिखा की शिक्षा-स्नातकोत्तर एवं कार्यक्षेत्र-चिकित्सा प्रतिनिधि है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत लोगों के शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य की भलाई के लिए निःशुल्क शिविर लगाती हैं। 
लेखन विधा-कविता है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-जनजागृति,आदर्श विचारों को बढ़ावा देना,अच्छाई अनुसरण करना और लोगों से करवाना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-मुंशी प्रेमचंद और प्रेरणापुंज भी यही हैं। विशेषज्ञता-निर्भीकता और आत्म स्वाभिमानी होना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अखण्डता को एकता के सूत्र में पिरोने का यही सबसे सही प्रयास है। हिन्दी को राष्ट्रीय भाषा घोषित किया जाए,और विविधता को समाप्त किया जाए।”