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बड़े दम का ‘पट्ठा’

सुनील चौरे ‘उपमन्यु’ 
खंडवा(मध्यप्रदेश)

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‘पट्ठा’ याने प्रत्येक काम में दक्ष, जी हाँ,जो हास-परिहास,चतुराई से अपना काम निकलवा ले या फिर अपना काम करवा ले,मेरे ख्याल से उसी का नाम पट्ठा होता है। मुझे याद है,बामन्दा जी दामनदा जी की तारीफ़ कर रहे थे। कह रहे थे-“सभी दूर प्रसिद्ध हो चुका है मेरा पट्ठा।” यानि पट्ठा बनाया जाता है,व उस पर उस्ताद गौरवान्वित होता है। पट्ठा बनने के लिए पट्ठे को उस्ताद का शिष्य होना जरूरी है। यानि पट्ठे को उस्ताद मिल जाये तो,उसकी पट्ठागिरी चल निकली। फिर जब पट्ठा कुछ भी अच्छा कर गुजरता है तो गुरु गौरवान्वित हो कहते हैं-“पट्ठा किसका है।”
प्रत्येक स्तर पर उस्तादों ने अपने पट्ठे तैयार कर अपना नाम रोशन कर लिया है। पट्ठे भी ऐसे कि उस्ताद का सुमिरण कर उनके चरणों की धूल कागज की पुड़िया में बाँध अपने पास ही रखते हैं,बल्कि यूँ कहें कि कुछ भी काम करने के पूर्व उस धूल को अपने मस्तक पर लगाकर अपने काम को करते हैं,ताकि उन्हें अभूतपूर्व सफलता मिले।
गुरु या उस्ताद के भक्त पट्ठों को सफलता-आशातीत सफलता मिलती है। इस सफलता को दिलवाने में गुरु या उस्ताद ऐड़ी- चोटी का जोर लगा देते हैं। लोग पट्ठे की तारीफ करने लग जाते हैं,भरी भीड़ में मंच से गर्व से गुरु कहते हैं-“भाई नाम तो करेगा ही, आखिर ‘पट्ठा’ तो हमारा ही है।” यह सुन लोग भी गुरु की जय-जयकार करने लग जाते हैं।
यूँ तो प्रत्येक व्यक्ति के लिए ‘ गुरु’ होना जरूरी है। बिन गुरु ज्ञान अधूरा, परन्तु सबके सब पट्ठे बनें,यह भी सम्भव नहीं,क्योंकि पट्ठों को ‘पट्ठे’ बनने में गुरु की जांच में सफल होना होता है। यह जांच किलष्ट व सरल दोनों तरह से होती है।
विद्यार्थी जीवन में गुरु का महत्व काफी होता है,गुरु से गुर लेकर ही विद्यार्थी अपने जीवन को निखारते हैं। जीवन में पढ़-लिखकर जब उत्कृष्ट पद पर विद्यार्थी विराजित होते हैं,तब भी
गुरु प्रसन्न हो कह देते हैं कि-“पट्ठा किसका है ?”
गुरूओं का भी पट्ठों के बिना मन नहीं लगता है,साहित्य की एक गोष्ठी में साहित्यिक गुरु की आँखें अपने पट्ठे को खोज रही थी। गुरु सुखलाल ‘सुक्खू’ बैचेन दिखाई दे रहे थे,इतने में पट्ठा भीड़ को चीरते हुए हॉल में बने मंच पर पहुंचा और सीधे गुरु के चरणों में मत्था टेक दिया। गुरु ने फूलकर पट्ठे के माथे को चूमा व आशीष प्रदान किया। मंच पर सीधे प्रवेश सामान्य के लिए वर्जित रहता है,केवल पट्ठा ही सीधे मंच पर अपनी चाटुकारिता के बल पर प्रवेश कर पाता है। ‘जय हो पट्ठे की।’ गुरु सुखलाल ‘सुक्खू’ व पट्ठे का प्रेम देख हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गुंजायमान हो गया था। गुरु ने गोष्ठी संचालक को इशारा किया, संचालक समझ गया। उसने बिना देर किये माइक पर पट्ठे को आमंत्रण दे दिया। पट्ठे ने माइक पकड़ने के पहले अपने गुरु ‘सुक्खू’ के पैर पकड़े और उनकी चरण रज माथे पर लगाई,जैसे पत्नी अपने पति की चरण रज को माथे पर लगाती है।
पट्ठे ने माइक पकड़ कर कहा-“आज मैं जो कुछ भी हूँ,मेरे गुरूवर के कारण हूँ। मुझे कई बड़े पुरस्कार इनकी अनुशंसा के कारण प्राप्त हुए। मुझे आगे बढ़ाने के लिये यदि किसी को पीछे हटाना पड़ा,तो गुरूवर ने उन्हें पीछे हटा मुझे आगे किया। मेरे गुरूवर जहाँ भी जाते हैं,मुझे अवश्य साथ रखते हैं। हमारे साहित्यिक गुरु की पहुंच शासन,प्रशासन दोनों जगह है,मैं तो कुछ भी नहीं,लेकिन गुरूवर के कारण मुझ जैसे अज्ञानी को भी प्रदेश में,देश में लोग पहिचानने लगे,उनके ही कारण मेरी रचनाएं छपने लगी।” पट्ठा धाराप्रवाह हो गुरु की तारीफ़ किये जा रहा था,तो इधर गुरूवर के चेहरे पर पोल खुलने का भय स्पष्ट झलक रहा था। पट्ठा आगे बोले जा रहा था कि-“मुझे मेरी पुस्तक पर जो पुरस्कार मिला,वह भी गुरूवर की देन ही रही, वरना किसी परिषद से,या संस्था से, अथवा अन्य जगह से पुरस्कार प्राप्त होना मुश्किल होता है।गुरूवर ने वहां के अध्यक्ष-अधिकारी को फोन लगाया और पुरस्कार मेरी झोली में आ गया। धन्य हैं मेरे गुरूवर।” इतना कहकर पट्ठा गुरु के चरणों में पुनः दण्डवत हो गया। गुरूवर खिसियानी हँसी हँसते हुए कक्ष से बाहर हो गये,किन्तु पट्ठा तो पट्ठा ठहरा…गुरु से भी ज्यादा प्रसिद्ध हो साहित्य जगत में छा गया।
‘गुरु बिन गत’ नहीं,इसीलिये पट्ठे,गुरु बनाने में काफी परिश्रम करते हैं।
एक जगह कुश्ती का कार्यक्रम था। मल्लू पहलवान के पट्ठे ताल ठोंकते हुए मैदान में उतरे,पर पहली ही पटकनी में मार खा गये। मल्लू पहलवान जोर से चिल्लाया-“कैसा पट्ठा है मेरा ?
नाक कटवा दी मेरी,दूसरा पट्ठा तैयार करना पड़ेगा।”
इतना कहना था कि दुबले-पतले पट्ठे में शक्ति का संचार हुआ व ऐसा दांव मारा कि सामने वाला पहलवान चारों खाने चित्त हो गया। मल्लू पहलवान ने खुश हो अपने पट्ठे को अपने कंधे पर बिठा मैदान के चारों और चक्कर लगाये व गर्व से बोला-“देखा मेरे पट्ठे को।”
पट्ठा बनाना इतना आसान भी नहीं,पट्ठे बनने के लिए गुरु की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। उनके द्वारा बताये गये प्रत्येक कार्य को करना पड़ता है, चाहे वह कार्य जायज हो या नाजायज। स्वाभिमानी इंसान अच्छा पट्ठा हो ही नहीं सकता।
ननकूराम पट्ठे की तो उम्र निकल रही है,किंतु वह अच्छा राजनीतिक पट्ठा बन ही नहीं सका। अपनी व्यथा बताते हुए बोला-“मैंने छोटे से लेकर बड़े दिग्गजों की अटैची उठाई,उनकी हर छोटी-बड़ी बात का ध्यान रखा। सेवा-सत्कार में कोई कमी नहीं रखी,फिर भी मैं ग्राम पंचायत का पंच नहीं बन सका,जबकि कालूराम ने ऐसी पट्ठागिरी दिखाई कि वह बड़े पद पर विराजित हो गया।
पट्ठा बनना हँसी-खेल नहीं। पट्ठे के लिए त्याग-तपस्या के साथ साथ जोड़-तोड़ की राजनीति में भी निपुणता हो,चाटुकारिता का गुण प्रथम दृष्टया हो। पट्ठे बनाने वाले मनीषी को सदैव खुश रखना चाहिये,अन्यथा किया-कराया सब पानी में प्रवाहित हो जाता है।
पट्ठों की अलग-अलग किस्में हैं-कोई पहलवान को पट्ठे के रूप में देखता है,कोई दादागिरी में ऊंचाई प्राप्त किये व्यक्ति को पट्ठे के रूप में देखता है। इस सम्बन्ध में युवाओं की बात तो निराली ही है,वह जब भी कोई सुंदर कन्या को देखता है,तो बरबस ही मुँह से निकल जाता है-“वाह क्या पट्ठा है।” अर्थात पट्ठे को लोग अपने-अपने तरीके से समझने का प्रयास करते हैं।
पिछले दिनों हास्य व्यंग्य की एक गोष्ठी में जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। उसमें जैसे ही पहुंचा तो तपाक से एक साहित्यिक व्यक्ति ने कहा-“ओह ‘बड़ा बम का पट्ठा’ आ गया।”
मैंने उनकी बातों को स्वीकार किया कि चलो किसी ने तो कहा पट्ठा बड़ा बम का,किन्तु बड़ा बम का पट्ठा होने में ‘बड़े दम’ की आवश्यकता होती है। निवास स्थान के बारे में की गई बात तो स्वीकार्य है,किन्तु ‘बड़ा बम’ कई मामलों में ‘बड़ा दम’ वाला है,पर
मैं कमजोर चेचिस वाला,साहित्य और कलम का पुजारी ‘पट्ठे’ की पूर्ण परिभाषा में नहीं आता हूँ,उसके मापदंडों पर खरा नहीं हूँ,न ही वह सब-कुछ कर सकता हूँ,जो मेरी नज़र में करने योग्य नहीं।इसलिए,शायद मैं पट्ठेगिरी में अनुतीर्ण हो जाता हूँ।
हाँ,ऐसी पट्ठागिरी देख बड़ा ‘दम’ चलने लग जाता है,दम के चलते श्वांसें लम्बी-लम्बी चलने लग जाती हैं,किन्तु यमराज का रुझान मुझमें नहीं,शायद यमराज भी अच्छा पट्ठा चाहते हों… ?

परिचय-सुनील चौरे का उपनाम ‘उपमन्यु’ है। सुनील चौरे ‘उपमन्यु’ की जन्मतिथि २० अप्रैल १९६० है। आपने वाणिज्य में स्नातक सहित विधि और अन्य विषय में स्नातकोत्तर भी किया हुआ है। विभिन्न समाचार पत्रों में आपके रचित व्यंग्य लेख एवं कविता  प्रकाशित हैं। नुक्कड़ नाटकों में गहन रुचि रखने वाले श्री चौरे विभिन्न संस्थाओं द्वारा अभिनंदित हैं। ऐसे ही मुम्बई में टेलीफिल्म ‘भारत की शान’  कार्यक्रम में पंच परमेश्वर के रूप में निर्णायक भी रहे हैं। आपकी दो पुस्तकें प्रकाशनाधिन हैं। आपका निवास खंडवा(मध्यप्रदेश) स्थित रामेश्वर रोड पर है। आप कक्षा आठवीं से ही लेखन कर रहे हैं। इस अनवरत यात्रा में ‘मेरी परछाईयां सच की’(काव्य संग्रह) हिन्दी में अलीगढ़ से,व्यंग्य संग्रह ‘गधा जब बोल उठा’ जयपुर से,बाल कहानी संग्रह ‘राख का दारोगा’ जयपुर से तथा बाल कविता संग्रह भी जयपुर से ही प्रकाशित हो चुका है। एक कविता संग्रह हिन्दी में ही प्रकाशन की तैयारी में है। श्री चौरे के नाम लोकभाषा निमाड़ी में ‘बेताल का प्रश्न’ व्यंग्य संग्रह भी है तो,निमाड़ी काव्य संग्रह स्थानीय स्तर पर प्रकाशित है। आपका निवास खंडवा में है। आडियो कैसेट,विभिन्न टी.वी. चैनल पर आपके कार्यक्रम प्रसारित होते रहते हैं। साथ ही आप अखिल भारतीय मंचों पर भी काव्य पाठ के अनुभवी हैं। परिचर्चा भी आयोजित कराते रहे हैं तो अभिनय में नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से साक्षरता अभियान हेतु कार्य किया है। जीवन संगिनी को वक्ष केन्सर से खो चुके श्री चौरे को साहित्य-सांस्कृतिक साहित्य-सांस्कृतिक कार्यक्रमों में वे ही अग्रणी करती थी। आप वैवाहिक जीवन के बाद अपने लेखन के मुकाम की वजह अपनी पत्नी को ही मानते हैं।