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बढ़ती जनसंख्याःक्या-क्या करें

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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संयुक्त राष्ट्र संघ की ताजा रपट के मुताबिक दुनिया की आबादी ८ अरब से भी ज्यादा हो गई है। पिछले ५० साल में दुनिया की जनसंख्या जितनी तेजी से बढ़ी है, पहले कभी नहीं बढ़ी। अभी तक यही समझा जा रहा था कि चीन दुनिया का सबसे बड़ी आबादीवाला देश है, लेकिन भारत उसको भी मात करने वाला है। भारत में इधर बढ़े १७ करोड़ लोग उसे दुनिया का सबसे बड़ा देश बना देंगे। ऐसा नहीं है कि, भारत जनसंख्या के हिसाब से ही बहुत आगे बढ़ गया है। इस देश ने कई मामलों में सारी दुनिया से बेहतर उपलब्धियां भी हासिल की हैं। इस समय डिजिटल व्यवहार में वह दुनिया में सबसे आगे है। जहां तक प्रवासी भारतीयों का सवाल है, दुनिया के जितने अन्य देशों में भारतीय मूल के लेाग शीर्ष स्थानों पर पहुंचे हैं, दुनिया के किसी मुल्क के लोग नहीं पहुंच सके हैं। भारतीय मूल के लोग जिस देश में भी जाकर बसते हैं, वे हर क्षेत्र में आगे निकल जाते हैं। वे अपने सभ्य और सुसंस्कृत आचरण के लिए सारे विश्व में जाने जाते हैं, लेकिन दुनिया की बढ़ती हुई आबादी कई देशों के लिए तो खतरनाक सिद्ध हो ही रही है, वह भारत के लिए भी चिंता का विषय है। यदि आपके देश की या परिवार की आबादी बढ़ती चली जाए और उसकी जरूरतों की पूर्ति भी होती चली जाए तो कोई बात नहीं है, लेकिन साथ-साथ गरीबी और असमानता भी बढ़ती चली जाए तो वह समाज के लिए बोझ बन जाती है। यों तो भारत में जनसंख्या की रफ्तार पिछले दशकों के मुकाबले थोड़ी कम हुई है, लेकिन हमारे देश में अभी भी लगभग १०० करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनके लिए हम पर्याप्त भोजन, निवास, वस्त्र, शिक्षा, चिकित्सा और मनोरंजन की व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। हमारी जनसंख्या-बढ़ोतरी का यह अच्छा पहलू है कि भारत में युवा लोगों का अनुपात वृद्धों के मुकाबले बेहतर है। दुनिया के मालदार देशों में दीर्घायु की सुविधाओं के कारण वृद्धों की संख्या कहीं ज्यादा है। जनसंख्या के खतरे से निपटने के लिए भारत सरकार को २ बच्चों वाले प्रतिबंध पर भी तुरंत विचार करना होगा। जनसंख्या की दृष्टि से भारत का फायदा उसके इस तेवर में भी है कि, पढ़े-लिखे युवक बढ़िया आमदनी की तलाश में विदेशों में जाकर अपना ठिकाना बना लेते हैं, लेकिन भारत चाहे तो अपने दक्षिण और मध्य एशिया के देशों में विकास का इतना बड़ा अभियान चला सकता है कि देश के कई करोड़ लोगों को वहां रोजगार मिल सकता है और वे वहां बस भी सकते हैं। मध्य एशिया के पांचों देशों का क्षेत्रफल भारत से डेढ़ गुना है और उनकी आबादी मुश्किल से साढ़े ७ करोड़ है। भारतीय लोगों को अगर उचित मार्गदर्शन और सुविधा मिले तो वे न केवल भारत की बढ़ती आबादी की समस्या हल कर सकते हैं, बल्कि प्राचीन आर्यावर्त की अकूत संपदा का दोहन करके एशिया को यूरोप से भी आगे ले जा सकते हैं।

परिचय– डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।


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