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बाल केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक की भूमिका

डॉ. प्रभु चौधरी
उज्जैन(मध्यप्रदेश)

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“शिक्षा जीवन का उजास है,
शिक्षा क्षमताओं का विकास है।
बाल हृदय यदि एक सुवास तो,
शिक्षा उसका ही सुझाव हैll”
वास्तव में शिक्षा एक महत्वपूर्ण व सर्वव्यापी विषय है। यह मानव की विशेष उपलब्धि है। शिक्षा ने हर युग में समाज को दिशा व स्वरूप देने में सहायता की है। समाज की आवश्यकतानुसार शिक्षा व्यवस्था परिवर्तित होती रही है। शिक्षा का अर्थ पहले ज्ञान को बालक के मस्तिष्क में भरने से लगाया जाता था,परन्तु अब ऐसा नहीं है। आज शिक्षा का अर्थ बालक की जन्मजात शक्तियों का विकास करके उसके जीवन को सफल बनाने से है। अब यह नहीं माना जाता कि शिक्षा प्रक्रिया में शिक्षक सक्रिय रहे,वरन् बालक की सक्रियता को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जाता है। बालक के प्रभावशाली सक्रिय योगदान के लिए आवश्यक है कि उसे ऐसी सुविधाएं प्रदान की जाएं,जिससे उसमें अंतर्हित शक्तियों तथा क्षमताओं का विकसित होने का अवसर प्राप्त हो सके। प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री जान डी.वी. का यह मानना है कि बालक को निरन्तर ऐसे अवसर मिलने चाहिए जिससे वह अपनी योग्यता सामर्थ्य तथा सुरूचि के अनुकूल विकास कर सके।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति की अनुशंसा में भी कहा गया है कि बालक एक सकारात्मक सम्पत्ति व बहुमूल्य है,जिसे सावधानीपूर्वक सहृदयता से पोषित एवं विकसित करना चाहिए। चूँकि, प्रत्येक बालक की विकास की अलग-अलग आवश्यकता होती है। अतः उसकी शिक्षा की व्यवस्था भी उसकी आवश्यकता,रूचि व क्षमता को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। भावी पीढ़ी को इस प्रकार शिक्षित करना होगा कि उनसे आत्मविश्वास को और दृढ़ता से समस्याओं के रचनात्मक समाधान की योग्यता विकसित हो सके एवं मानव मूल्यों व सामाजिक न्याय के प्रति उनकी निष्ठा हो। इस संदर्भ में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में छात्र केन्द्रित अध्ययन प्रक्रिया की अनुशंसा की है।
#बाल केन्द्रित शिक्षा से अभिप्राय-
बाल केन्द्रित शिक्षा से अभिप्राय है कि शैक्षिक प्रक्रिया का संचालन बालक को केन्द्र में रखकर किया जाना चाहिए। आज की शैक्षिक व्यवस्था में बालक का स्थान महत्वपूर्ण है। अतः शिक्षक को अध्यापन प्रक्रिया से हटकर अध्ययन प्रक्रिया पर बल देना चाहिए। अर्थात् बालक में सीखने की दक्षता को विकसित किया जाना चाहिए। बालक का सीखना उसकी मूलभूत क्षमताओं चिंतन,मनन,तर्क स्मरण कल्पना एवं इन्द्रिय प्रत्यक्षीकरण पर निर्भर करता है।
बालक अपने परिवेश की प्रत्येक वस्तु एवं घटना का ध्यानपूर्वक अवलोकन करता है तथा हर समय कुछ न कुछ सीखता रहता है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए बालक के लिए शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए।
आधुनिक शिक्षाविद् भी बालक को शिक्षा का मूलाधार मानते हैं,इस अर्थ में वर्तमान शिक्षा बाल केन्द्रित कही जाती है,जिसमें शिक्षा व्यवस्था बालक के अनुरूप निर्धारित की जाती है।
#बाल केन्द्रित शिक्षा में शिक्षक की भूमिका-
आमतौर पर यह माना जाता है कि बालक का मस्तिष्क कोरी स्लेट के समान है जिस पर जो चाहे लिखा जा सकता है,या बालक कच्ची मिट्टी के समान है जिसे शिक्षक जैसा चाहे वैसा मनचाहा आकार दे सकते हैं,परन्तु यह धारणा पूर्णतः सत्य नहीं है। अब यह स्वीकार किया जाने लगा है कि बालक सब जानता है जब यह विद्यालय आता है तो उसके पास अपनी कुछ जन्मजात प्रतिभा व योग्यता होती है। उसका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व होता है। सोच व विचार होते हैं, अपने संस्कार होते हैं,जिन्हें उचित वातावरण देकर समझदारी के साथ संवारने की आवश्यकता होती है। इस दिशा में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण है। शिक्षक भी इसे अपना दायित्व समझकर अध्यापन के साथ-साथ भिन्न भूमिकाओं का निर्वाह करता है वह मार्गदर्शक,परामर्शदाता,मित्र व पथ प्रदर्शक भी है। अन्य शब्दों में आज शिक्षक का कार्य अध्यापन तक ही सीमित नहीं रहा है। वरन् यह अनन्य भूमिकाओं का भी निर्वाह कर रहा है।
#शिक्षक मनोवैज्ञानिक के रूप में-
शिक्षा बालक के लिए परन्तु वास्तविकता में देखने में आता है कि शैक्षिक आयोजन में बालक पर ध्यान न देकर पाठयक्रम विद्यालय तथा उसकी व्यवस्थाओं पर ध्यान दिया जाता है,जबकि आवश्यकता इस बात की है कि समस्त व्यवस्थाएं बालक को केन्द्र में रखकर की जानी चाहिए। इस दिशा में शिक्षक की भूमिका अहम है। शिक्षक को इस बात की जानकारी होनी चाहिए कि बालक अपनी मानसिक एवं शारीरिक शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार करता है,वह कैसे सीखता है, क्या सोचता है। बालक को सीखना उसकी क्षमताओं,चिंतन,मनन,तर्क स्मरण और इन्द्रिय प्रत्यक्षीकरण पर निर्भर करता है।
प्रत्येक बालक दूसरे से भिन्न होता है,उसकी सीखने की क्षमताओं में भी अंतर होता है। विभिनन अध्ययनों से पता चलता है कि अधिकांश विद्यार्थियों में उपरोक्त क्षमताओं का अभाव पाया जाता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ऐसे बच्चों को सीखने की प्रक्रिया में अयोग्य पाया जाता है। यहां पर शिक्षक की भूमिका अहम हो जाती है। उसे बालक के मनोविज्ञान को समझकर उसी प्रकार का व्यवहार करना चाहिए,क्योंकि कई बार अयोग्यता उचित शैक्षिक वातावरण के न होने से भी आती है। यदि शिक्षक बालक को सीखने से संबंधित कमियों को दूर करने में सहायता करता है,तो बालक के सीखने की तत्परता बढ़ाई जा सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि पढ़ाने के तरीकों में बदलाव करें,शिक्षण में नई विधियों का प्रयोग करें, पाठयक्रम को लचीला बनाया जाए। विभिन्न पाठयेत्तर गतिविधियों में कौन-सा विद्यार्थी किस प्रकार की योग्यता रखता है,वह किस प्रकार के उत्तरदायित्व का वहन करने की क्षमता रखता है,इसकी जानकारी शिक्षक को होनी चाहिए। बाल मनोविज्ञान का ज्ञान होने से बालक को समझाने तथा उसकी विभिन्न समस्याओं को सुलझाने में सहायता मिलती है। इससे समय तथा शक्ति की भी बचत होती है।
#शिक्षक प्रेरक के रूप में-
बालक स्वभाव से जिज्ञासु होता है। वह हर घटना तथा वस्तु को ध्यान से देखता है। उसमें अनुकरण की स्वाभाविक प्रकृति पायी जाती है। बालक पर शिक्षक के आचरण, व्यवहार,स्वभाव व रहन-सहन का गहरा असर पड़ता है। इस बात को ध्यान में रखते हुए शिक्षक को चाहिए कि वह अपने आपको प्रेरक के रूप में प्रस्तुत करें। वास्तव में अध्ययन एक रोमांचकारी कार्य है,जिसमें स्वयं खोजने तथा समझकर सीखने की परिस्थितियों निर्मित की जाती है। एक अच्छा अध्यापक विद्यार्थी को उचित वातावरण देता है जिसमें बालक स्वयं करके सीखने के लिए प्रेरित हो सके। वह बालकों को समूह में कार्य करने के लिए प्रोत्साहित करता है। उन्हें आपसी वार्तालाप के अवसर देकर खोजी वृत्ति को विकसित करता है। एक-दूसरे के सम्पर्क में आने से उसमें व्यवहारिक कुशलता आती है तथा उनमें सामाजिकता की भावना भी विकसित होती है।
#शिक्षक निदेशक के रूप में-
विज्ञान तथा तकनीकी विकास के कारण सामाजिक व वैयक्तिक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण परिवर्तन हो रहे हैं। सामाजिक परिवर्तन शिक्षा को भी प्रभावित करते रहे हैं। इस कारण यह महसूस किया जा रहा है कि शिक्षक का दायित्व केवल शिक्षा देने तक ही सीमित नहीं है। उसे निदेशक के रूप में नई भूमिका का निर्वाह करना चाहिए। वास्तव में देखा जाए तो शिक्षक द्वारा इस भूमिका का निर्वाह प्राचीन काल से किया जा रहा है। गुरूजन शिक्षा देने के साथ निर्देशन का कार्य भी करते थे। शिक्षा समाप्त होने के उपरांत गुरू दीक्षांत उपदेश दिया करते थे,जिसमें वह शिष्य के उत्तरदायित्वों एवं जीवन में सफलता के लिए आवश्यक बातों पर प्रकाश डालते थे। ऐसा एक उपदेश तैत्तरीय उपनिषद में मिलता है, जिसका मुख्य भाव इस प्रकार है-
“सत्य बोलो धर्म का आचरण करो-स्वाध्याय से दूरी मत करो। अब तुमने शिक्षा पूरी कर ली है,यह मत समझो। आगे अध्ययन की आवश्यकता है,अपनी दक्षता में वृद्धि करते जाओ। यही शिक्षा है,वही उपदेश है।”
उपर्युक्त उपदेश विश्लेषण करें तो हमें आधुनिक निर्देशन के सभी महत्वपूर्ण सूत्र मिल जाते हैं। निर्देशन वैयक्तिक हो या सामूहिक,व्यवसायिक हो या शैक्षिक विद्यार्थी को जिस क्षेत्र में आवश्यकता होती है, शिक्षक उसे उचित निर्देशन देता है। विभिन्न स्तरों के विद्यार्थियों को भिन्न प्रकार से निर्देशन दिया जाता है। जैसे-प्राथमिक व माध्यमिक स्तर पर विद्यार्थियों में अच्छी आदतों का विकास करना,सीखने के प्रति रूचि उत्पन्न करना,समूह में रहने की शिक्षा देना,उनमें उत्तरदायित्व के निर्वाह का भाव विकसित करना। उच्च कक्षाओं में विषयों में चयन,कक्षा समायोजन,व्यक्तित्व या व्यवसायिक चुनाव की कठिनाई ऐसे क्षेत्र हैं, जहाँ शिक्षक निदेशक की भूमिका का निर्वाह कुशलतापूर्वक करता है।
#शिक्षक सचेतक के रूप में-
शिक्षक को यह कभी नहीं समझना चाहिए कि वह शिक्षा दे रहा है,क्योंकि इसे शिक्षा का उद्देश्य नष्ट हो जाता है। शिक्षक को सचेतक के रूप में भी कार्य करना चाहिए। शिक्षक का दायित्व केवल पाठ्यक्रम पूर्ण करने तक सीमित नहीं है,उसे विद्यार्थी का सर्वांगीण विकास करने की ओर ध्यान देना है। उसके चरित्र का निर्माण करना है,जीवन मूल्यों के प्रति आस्था जगानी है। मनुष्य निर्माण में सहायक विचारों का प्रतिस्थापना करना है। यह तभी संभव है,जब शिक्षक विद्यार्थी में रूचि लेंगे। शिक्षक को चाहिए कि वह छात्र के साथ आत्मीय संबंध स्थापित करें। उसकी कठिनाइयों को समझे,उसकी वैज्ञानिक समस्याओं का समाधान करने में उसकी सहायता करें। उसकी कक्षोत्तर गतिविधियों पर ध्यान दे। वह अपने साथियों के साथ किस प्रकार का व्यवहार करता है,इस ओर ध्यान देना चाहिए तथा जहां आवश्यक हो उसकी सहायता करनी चाहिए।
#शिक्षक परामर्शदाता के रूप में-
बालक अपने परिवार से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त कर विद्यालय में औपचारिक शिक्षा प्राप्ति के लिए आता है। इस दौरान वह अपने परिवेश व परिवार के प्रति संवेदनशील रहता है। कई बार वह अपनी शिक्षा तथा भविष्य (करियर) को लेकर चिंतित रहता है। उसकी अपनी अनेक समस्याएं होती है जो देखने में तो सामान्य-सी लगती है,परन्तु यदि उनका उचित समय पर समाधान न किया जाये,तो इससे कठिन परिस्थितियां निर्मित होती है, वह पढ़ाई में पिछड़ने लगता है। अपने- आपको असुरक्षित महसूस करने लगता है। वह कक्षा में या सहपाठियों के साथ सहयोग नहीं करता। इन समस्याओं का समाधान उचित परामर्श द्वारा किया जा सकता है। इस क्षेत्र में शिक्षक की भूमिका महत्वपूर्ण है। शिक्षक को चाहिए कि वह विद्यार्थी के साथ मित्रवत् व्यवहार करे। उसकी अद्वितीय से उसका परिचय कराएं। उसे अपनी क्षमताओं का सम्पूर्ण उपयोग करना सिखाएं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि वर्तमान समय की आवश्यकता के अनुरूप शिक्षक को हर प्रकार की भूमिका के लिए तत्पर रहना चाहिए,तभी छात्र केन्द्रित शिक्षा की सार्थकता हो सकेगी।

परिचय-डॉ.प्रभु चौधरी का निवास जिला उज्जैन स्थित महिदपुर रोड पर है। डॉ. चौधरी का जन्म १९६२ में १ अगस्त को उज्जैन में हुआ है। इनकी शिक्षा-हिन्दी और संस्कृत में पी-एच.डी. है। हिन्दी सहित अंग्रेजी संस्कृत,गुजराती तथा बंगला भाषा भी जानने वाले प्रभु जी की ४ प्रकाशित हो चुकी है। आप एक संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं,जो शिक्षकों तथा हिंदी के लिए कार्यरत है। साथ ही राष्ट्रीय कई संस्थाओं में उपाध्यक्ष,सम्पादक सदस्य(नई दिल्ली) और प्रदेश संयोजक हैं। आपको सम्मान के रूप में-साहित्य शिरोमणि,विद्या सागर एवं विद्या वाचस्पति,आदर्श शिक्षक(राज्य स्तरीय),राजभाषा गौरव(दिल्ली),हिन्दी सेवी सम्मान(बैंगलोर),हिन्दी भूषण सम्मान उपाधि,भाषा भूषण सम्मान,तुलसी सम्मान (भोपाल),कादम्बरी सम्मान तथा स्व. हरिकृष्ण त्रिपाठी कादम्बरी सम्मान(जबलपुर) है। प्रकाशन में आपके नाम-राष्ट्रभाषा संचेतना (निबंध संग्रह-२०१७),हिन्दी:जन भाषा से विश्व भाषा की राह पर(२०१७) प्रमुख है। कई अन्तरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय शोध संगोष्ठियों मेंआपकी समन्वयक के रूप में सहभागिता रही है। आपकी लेखन विधा मूलतः आलेख हैl राजभाषा,राष्ट्रभाषा,देवनागरी लिपि तथा सम-सामयिक विषयों एवं महापुरूषों के बारे में लगभग ३००० लेख प्रकाशित हुए हैंl डॉ.चौधरी की लेखनी का उद्देश्य हिंदी भाषा की बढ़ोतरी करना हैl