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बुजुर्गों के प्रति हो समुचित व्यवहार

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस (१अक्टूबर) विशेष…

आजकल हमारे समाज में बुजुर्ग-सयाने लोगों की बहुत दयनीय स्थिति है। विशेष रूप से वो वृद्ध, जिनकी आमदनी का कोई जरिया नहीं रहता है। इसके अलावा जिन बच्चों को पढ़ाया-लिखाया, वक्त के साथ उनके व्यवहार-नजरिए में अंतर आ जाता है। जो पेंशन भोगी हैं, वे कुछ सीमा तक सुरक्षित कहे जा सकते हैं, पर उम्र का तकाज़ा पराधीनता को मजबूर कर देता है।
कहा गया है-वृद्धकाले मृत्ता भार्या बन्धुहस्ते गतं धनं, भोजनं च पराधीनं तिस्र: पुंसां विडम्बना:।
अर्थात वृद्धावस्था में पत्नी का देहांत हो जाना, अपने धन का भाई-बंधुओं के हाथ में चला जाना और भोजन के लिए दूसरों का मुँह ताकना-ये तीनों बातें मनुष्यों के लिए मृत्यु के समान दुःख देने वाली हैं।
‘अंतरराष्ट्रीय बुजुर्ग दिवस’ हर साल १ अक्टूबर को मनाया जाता है। यह दिन हमारे समाज में वरिष्ठ नागरिकों के महत्व के बारे में जागरूकता फैलाने और योगदान की सराहना करने के लिए मनाया जाता है। वरिष्ठ नागरिक समाज के नेताओं के रूप में अपने कंधों पर बहुत सारी जिम्मेदारी लेते हैं। वे समाज की परंपराओं-संस्कृति को भी आगे बढ़ाते हैं और ज्ञान को युवा पीढ़ी तक पहुंचाते हैं।
हालाँकि, वृद्ध लोग भी अत्यधिक असुरक्षित होते हैं, जिनमें कई गरीबी में पड़ जाते हैं, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं या भेदभाव का सामना करते हैं। उन्हें कभी-कभी दुर्व्यवहार का भी सामना करना पड़ता है, जिसका हानिकारक प्रभाव पड़ता है।
यह दिन अपने जीवन को खुशहाल बनाने के लिए वृद्ध लोगों के प्रति दुनिया की जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए भी मनाया जाता है।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार-६० वर्ष और उससे अधिक आयु के व्यक्तियों की जनसंख्या ९६२ मिलियन से बढ़कर १.४ बिलियन हो जाएगी। यानी विश्व स्तर पर ४६ फीसदी की वृद्धि २०१७ से २०३० के बीच है। संगठन के अनुसार- वर्तमान में इनकी जनसंख्या ६०० मिलियन है, जो २०२५ तक दोगुना और ५० तक २ बिलियन को छूने की ओर अग्रसर है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार जनसंख्या बुढ़ापा २१वीं सदी का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन होगा।
भारत सरकार विभिन्न योजनाएं चलाती है और ६० वर्ष से अधिक के लोगों को निवारक, पुनर्वास सेवाएं देती हैं। सरकार बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य देखभाल का राष्ट्रीय कार्यक्रम भी चलाती है, जो वरिष्ठ नागरिकों को विशेष उपचार देती है।

बुजुर्गों के प्रति संतानों का व्यवहार समुचित होना चाहिए। कारण कि, संतान भी भविष्य के बुजुर्ग हैं। जैसा व्यवहार करोगे, वैसा ही प्रतिफल अवश्य मिलेगा।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।