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भारत जोड़ोःखाली झुनझुना

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
गुड़गांव (दिल्ली) 
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राहुल गांधी के पास यदि भाजपा का कोई वैकल्पिक राजनीतिक दर्शन होता तो देश के समस्त विरोधी दलों को एक सूत्र में बांधा जा सकता था। खुशी है कि आज राहुल गांधी ने इसी बात को दोहराया है। उन्होंने अपनी भारत-यात्रा के दौरान कहा है कि भाजपा को हराने के लिए विरोधी दलों के पास कोई अपनी दृष्टि होनी चाहिए। राहुल को शायद पता नहीं है कि हमारे देश के सभी विरोधी दलों के पास जबर्दस्त दृष्टि है। हर दल के पास दो-दो नहीं, चार-चार आँखें हैं। इन चारों से वे चारों तरफ देखते हैं और उन्हें बस एक ही चीज़ दिखाई पड़ती है। वह है-सत्ता, कुर्सी, गद्दी! इसके अलावा सभी दल खाली-खट हैं। उनके पास सिद्धांत, विचारधारा, नीति, कार्यक्रम के नाम पर खाली झुनझुना होता है। उसे वे बजाते रहते हैं। उनके पास जाति, मजहब, संप्रदाय, भाषा, प्रांतवाद आदि की सारंगियां होती हैं। चुनाव के दिनों में वे इन झुनझुनों और सारंगियों के जरिए अपनी नय्या पार लगाने में जुटे रहते हैं। और यदि वे सत्ता में हों तो वे रेवड़ियों का अंबार लगा देते हैं। किसी नेता या दल के पास भारत की गरीबी और असमानता को दूर करने का कोई नक्शा नहीं होता, उन्हें पता ही नहीं है कि भारत को संपन्न और शक्तिशाली बनाने के लिए क्या-क्या कदम उठाने चाहिए और सभी दल सत्तारुढ़ होने के लिए नोट और मत की झांझ पीटते रहते हैं। सत्तारुढ़ होने पर वे नौकरशाहों की नौकरी करने लगते हैं। भारत में सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टी ऐसी है, जिसके कुछ नेता पढ़े-लिखे और विचारशील हैं, लेकिन यह भी मलयाली उप-राष्ट्रवाद (केरल) की बेड़ियों में जकड़ी हुई है। कांग्रेस एकमात्र विरोधी पार्टी है, जिसके सदस्य आज भी देश के हर जिले में मौजूद हैं, लेकिन दुर्भाग्य है कि उसके पास न कोई नेता है और न ही नीति है। लगभग १०-१२ वर्ष पहले राहुल गांधी में कुछ संभावना दिखाई पड़ रही थी लेकिन इतना लंबा वक्त बापकमाई और अम्माकमाई को जीमने में गुजर गया। अब जब कांग्रेस ‘वेंटिलेटर’ पर आ गई है, राहुल ने राजनीति का क, ख, ग सीखने की कोशिश की है, लेकिन विरोधी दलों के नेता तीन-चार माह के इस नौसिखिए राजनीतिक शिशु को अपना गुरु कैसे धारण कर लेंगे ? अखिलेश यादव और मायावती ने ‘भारत-जोड़ो यात्रा’ में जुड़ने से मना कर दिया है। भला नीतिश, सीताराम येचूरी, ममता बेनर्जी, कुमार स्वामी, पटनायक जैसे वरिष्ठ नेता कैसे जुड़ेंगे ? यदि जुड़ भी गए तो इनका गठबंधन कैसे बनेगा ? और बन भी गया तो वह चलेगा कितने दिन ? बस, यदि कांग्रेस ही जुड़ी रहे और टूटे नहीं तो हम मान लेंगे कि यह भारत जोड़ो-यात्रा सफल रही।

परिचय– डाॅ.वेदप्रताप वैदिक की गणना उन राष्ट्रीय अग्रदूतों में होती है,जिन्होंने हिंदी को मौलिक चिंतन की भाषा बनाया और भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत संघर्ष और त्याग किया। पत्रकारिता सहित राजनीतिक चिंतन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति और हिंदी के लिए अपूर्व संघर्ष आदि अनेक क्षेत्रों में एकसाथ मूर्धन्यता प्रदर्शित करने वाले डाॅ.वैदिक का जन्म ३० दिसम्बर १९४४ को इंदौर में हुआ। आप रुसी, फारसी, जर्मन और संस्कृत भाषा के जानकार हैं। अपनी पीएच.डी. के शोध कार्य के दौरान कई विदेशी विश्वविद्यालयों में अध्ययन और शोध किया। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त करके आप भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा है। इस पर उनका निष्कासन हुआ तो डाॅ. राममनोहर लोहिया,मधु लिमये,आचार्य कृपालानी,इंदिरा गांधी,गुरू गोलवलकर,दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी सहित डाॅ. हरिवंशराय बच्चन जैसे कई नामी लोगों ने आपका डटकर समर्थन किया। सभी दलों के समर्थन से तब पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले। श्री वैदिक ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ १३ वर्ष की आयु में हिंदी सत्याग्रही के तौर पर १९५७ में पटियाला जेल में की। कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार डॉ.वैदिक लगभग ८० देशों की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कर चुके हैं। बड़ी उपलब्धि यह भी है कि १९९९ में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आप पिछले ६० वर्ष में हजारों लेख लिख और भाषण दे चुके हैं। लगभग १० वर्ष तक समाचार समिति के संस्थापक-संपादक और उसके पहले अखबार के संपादक भी रहे हैं। फिलहाल दिल्ली तथा प्रदेशों और विदेशों के लगभग २०० समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर आपके लेख निरन्तर प्रकाशित होते हैं। आपको छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार मिले हैं तो भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान दिए एवं अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया है। आपकी प्रमुख पुस्तकें- ‘अफगानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेजी हटाओ:क्यों और कैसे ?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’,‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’,‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका:इंडियाज आॅप्शन्स’,‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो ?’ और ‘वर्तमान भारत’ आदि हैं। आप अनेक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित हैं,जिसमें विश्व हिन्दी सम्मान (२००३),महात्मा गांधी सम्मान (२००८),दिनकर शिखर सम्मान,पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार,हिन्दी अकादमी सम्मान सहित लोहिया सम्मान आदि हैं। गतिविधि के तहत डॉ.वैदिक अनेक न्यास, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय हैं तो भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद से भी जुड़े हुए हैं। पेशे से आपकी वृत्ति-सम्पादकीय निदेशक (भारतीय भाषाओं का महापोर्टल) तथा लगभग दर्जनभर प्रमुख अखबारों के लिए नियमित स्तंभ-लेखन की है। आपकी शिक्षा बी.ए.,एम.ए. (राजनीति शास्त्र),संस्कृत (सातवलेकर परीक्षा), रूसी और फारसी भाषा है। पिछले ३० वर्षों में अनेक भारतीय एवं विदेशी विश्वविद्यालयों में अन्तरराष्ट्रीय राजनीति एवं पत्रकारिता पर अध्यापन कार्यक्रम चलाते रहे हैं। भारत सरकार की अनेक सलाहकार समितियों के सदस्य,अंतरराष्ट्रीय राजनीति के विशेषज्ञ और हिंदी को विश्व भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने के लिए कृतसंकल्पित डॉ.वैदिक का निवास दिल्ली स्थित गुड़गांव में है।

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