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मंजू सक्सेना की ग़ज़लों में सब कुछ एकसाथ-सिद्धेश्वर

पटना (बिहार)।

मंजू सक्सेना की कलम की तलखियत को बयां करती है, और अपने नए गजल संग्रह ‘अनछुई छुवन’ की अधिकांश ग़ज़लों के समकालीन मिजाज से पाठकों को परिचय कराती है। यह बहुत बड़ी बात है, जब एक लोकप्रिय कथा लेखिका ग़ज़ल की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना पाने में बिल्कुल सक्षम दिख रही है। मंजू सक्सेना की ग़ज़लों में सब कुछ एकसाथ है।
भारतीय युवा साहित्यकार परिषद के तत्वाधान में गूगल मीट के आभासी माध्यम से कवि सम्मेलन का संचालन करते हुए संयोजक सिद्धेश्वर ने यह उद्गार व्यक्त किए। डॉ. मंजू सक्सेना की गजल कृति ‘अनछुए स्पर्श’ पर समीक्षात्मक डायरी प्रस्तुत करते हुए सिद्धेश्वर ने कहा कि, मंजू सक्सेना की इस पूरी पुस्तक को पढ़ते हुए पाठकों को उर्दू और हिंदी गजलों का स्वाद एकसाथ मिल जाता है। इस संग्रह में कई ऐसी ग़ज़लें है, जो एक लंबे समय तक पाठकों के हृदय में गुंजायमान रहेगी, यह बात मैं पूरी शिद्दत के साथ कर सकता हूं l मंजू सक्सेना की गजलों में नारी मन की व्यथाएं, सामाजिक पारिवारिक कुरीतियाँ, जीवन की विसंगतियाँ सब कुछ एकसाथ देखने को मिलती है। वह कहती है कि-‘कर दूं सभी को खुश मैं वो हुनर कहां से लाऊं ?/सबकी तपिश मिटा दे वो शजर कहां से लाऊं ?/सबका जुदा नजरिया राहें अलग-अलग है /एक कारवां बना दे वो डगर कहां से लाऊं ?’
मुख्य अतिथि कथाकार डॉ. मंजू सक्सेना ने कहा कि, ग़ज़ल हिंदी की हो या उर्दू की, शायर जो कहना चाहता है बात वही महत्वपूर्ण होती है। अध्यक्षीय उद्बोधन में रशीद गौरी (राजस्थान) ने कहा कि, काव्य में जीवन की अनुभूत संवेदनाओं का शिल्प मय भाव चित्रण होता है। काव्य समाज के लिए उपयोगी हो तभी वह सार्थक होता है। हर विधा की अपनी उपयोगिता और श्रेष्ठता होती है। आज ग़ज़ल अपनी लोकप्रियता के कारण प्रथम पंक्ति में स्थापित है। श्रीमती सक्सेना जी की ग़ज़लें प्रतीकात्मक सहजता के साथ अपनी बात कहने में कामयाब हैं।

दूसरे सत्र के आरंभ में रशीद गौरी ने अपनी ग़ज़ल प्रस्तुत की। रश्मि सहित सुधा पांडे, इंदू उपाध्याय, सपना चंद्, राज प्रिया रानी एवं निशा भास्कर आदि ने भी ग़ज़ल और कविताओं का पाठ कर मनमुग्ध कर दिया। कमल सक्सेना, माधवी जैन, मीना कुमारी परिहार, लोकनाथ मिश्रा और डॉ. श्याम गुप्ता ने भी समाँ बांध दिया।

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