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मन भर सोना दान

अवधेश कुमार ‘आशुतोष’
खगड़िया (बिहार)
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मंदिर में करते बहुत,मन भर सोना दान।
भूखा खातिर है नहीं, एक अदद पकवान।।

भगवन तो खाते नहीं,उन्हें चढ़े पकवान।
जिनको को रोटी चाहिए,उन्हें मिला अपमानll

भगवन आदी हो गए,नित सुनने को शोर।
मंदिर-मस्जिद है जहां,बजता भोंपू जोरll

जो जग को नित चालते,देते हर सुख भोग।
उनको मंदिर में यहां,रोज चलाते लोगll

चींटी को जब पर लगे,समझो निकट विनाश।
वैसे ही कुछ लोग को,लगे पंख हो नाशll

थोड़ा बल पर जो करें,ढेरों मान गुमान।
उसका मिट जाता सखा,जग से नाम निशानll

कभी गर्व मत कीजिए,यह प्रभु का आहार।
करे गर्व जो रात-दिन,कूच करे संसारll

जो सत का अनुसर करे,सत को ले पहचान।
वैसे ही तो लोग को,कहते सब विद्वानll

जाने-अनजाने बने,दुनियाभर का पाप।
जो करता निष्काम हो,मेटे निज संतापll

नारी से संसार है,इससे जग गुलजार।
नारी बिन होता जगत,मानो जंगल झाड़ll

नारी में ममता अधिक,ज्यादा सेवा भाव।
सेवा से मिलता है इन्हें,शक्ति अमित सदभावll

भूखे को खाना मिले,यह उत्तम है दान।
पर सबका मत एक है,कन्यादान महानll

जहां स्वर्ग तँह नरक है,देखो दिल्ली लोग।
एक तरफ सुख भोग है,एक तरफ है रोगll

धरती सत पर है टिकी,यह सच्ची है बात।
वरना जग में झूठ की,होती क्या औकातll

आधी पृथ्वी है जगी,आधी पर है रात।
कैसे कह दे नींद में,सोई है भू भ्रातll

धरती सहती कष्ट नित,देती हर सुख लोग।
स्वच्छ रखें परिवेश यदि,क्योंकर होगा रोगll

धरती सिकुड़ी जा रही,फैले जाते लोग।
कैसे मनु जी पायगा,बिन भोजन सुख भोगll

जब बंदी थी नोट की,अनगिन लगे दलाल।
कुछ को मालामाल कर,खुद भी हुए निहालll

पंगत थी मजदूर की,पैसा लिया दलाल।
करते रहे सफेद वे,कालाधन का मालll

जिसका धन ज्यादा गया,वह ही है बेजार।
बाकी सब खुशहाल हैं,गुण गाता सरकारll

कालाधन जिसका लुटा,वह श्रीमन बेहोश।
घपला तो अब दूर है,नहीं आ रहे होशll

पहले नित कश्मीर में,आतंकी का डंक।
बंदी जबसे नोट की,कुंद धार आतंकll

निधिरूपी संसार है,भवसागर है नाम।
बेड़ा उसका पार है,जो भज लेता रामll

बड़े-बड़े हैं कह गए,लाख टके की बात।
मीठी बोली सुन सदा,खिलता मुख परिजातll

जो भी हम हैं सोचते,या फिर करते काम।
सबके सब ही कर्म हैं,श्रेष्ठ कर्म निष्कामll

धरती सबको पोसती,ज्यों माता निज लाल।
सबका भरती पेट यह,रखे तुष्ट निहालll

बुत की पूजा है ढोंग है,कह पीटे कुछ ढोल।
कहो थूक पितु बिम्ब पर,काठ मारता बोलll

कैसे मैं वर्णन करूँ,उस दाता का नेह।
जो सब पर है बरसता,नित सावन-सा मेहll

शास्त्र सिखाता है हमें,यह जग है परिवार।
पर अंग्रेजी सोच में,पूरा जग बाजारll

जीवन बीता जा रहा,अभी होश संभाल।
जीवन को सुखमय बना,भजकर नित गोपालll

हवा-हवाई घोषणा,खींचे सबका ध्यान।
ज्यों ही कुछ दिन बीतता,बनते वे अंजानll

जब तक मानव जान है,तब तक वह धनवान।
चाहे बेचे आँख या,बेचे अंग दुकानll

सत संगत ऊपर चढ़े,चढ़ता सिर संसार।
रज समीर का संग पा,देखे दुनिया द्वारll

सबसे बढ़कर एक धन,दुनिया में संतोष।
इसके आगे तुच्छ है,दुनियाभर का कोषll

कृपा चाहते राम की,भज लें शिव हर शाम।
जो होवे उनकी कृपा,मिल जाएंगे रामll

दाने-दाने पर लिखा,इक भोक्ता का नाम।
खाने वाले लाख हैं,दाता केवल राम रामll

खाली हाथ न जाइए,दाता के दरबार।
श्रद्धा से अर्पित करें,कुछ-न-कुछ उपहारll

नोट वोट का खेल है,राजनीति का मंच।
कद्र यहां ईमान की,कहीं न दिखती रंचll

तिय ऋतुओं का सम्मिलन,कहीं घटा घनघोर।
महके कहीं बसंत तो,कहीं बरसती जोरll

कहीं गिरि कहीं कंदरा,कहीं गिरे रसधार।
नहीं प्रकृति से भिन्न है,शोभा इक सन्नारll

सब पर ही जादू करे,नारी का भूगोल।
चाहे क्यों ना हो यती,तन-मन जाते डोलll

नारी के सौंदर्य को,बांध सका है कौन ?
कलम लजाती देखकर,हो जाती है मौनll

नारी हो जब षोडशी,किस विधि रूप बखान।
सुंदरता क्षण-क्षण बढ़े,फैले किरण समानll

परिचय-अवधेश कुमार का साहित्यिक उपनाम-आशुतोष है। जन्म तारीख २० अक्टूबर १९६५ और जन्म स्थान- खगरिया है। आप वर्तमान में खगड़िया (जमशेदपुर) में निवासरत हैं। हिंदी-अंग्रेजी भाषा का ज्ञान रखने वाले आशुतोष जी का राज्य-बिहार-झारखंड है। शिक्षा असैनिक अभियंत्रण में बी. टेक. एवं कार्यक्षेत्र-लेखन है। सामाजिक गतिविधि के निमित्त साहित्यिक गतिविधियों में भाग लेते रहते हैं। लेखन विधा-पद्य(कुंडलिया,दोहा,मुक्त कविता) है। इनकी पुस्तक प्रकाशित हो चुकी है, जिसमें-कस्तूरी कुंडल बसे(कुंडलिया) तथा मन मंदिर कान्हा बसे(दोहा)है। कई रचनाओं का प्रकाशन विविध पत्र- पत्रिकाओं में हुआ है। राजभाषा हिंदी की ओर से ‘कस्तूरी कुंडल बसे’ पुस्तक को अनुदान मिलना सम्मान है तो रेणु पुरस्कार और रजत पुरस्कार से भी सम्मानित हुए हैं। इनकी लेखनी का उद्देश्य-साहित्य सेवा करना है। आपके लिए प्रेरणा पुंज-हिंदी की साहित्यिक पुस्तकें हैं। विशेषज्ञता-छंद बद्ध रचना (विशेषकर कुंडलिया)में है।