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माँ की ममता…मेरी जन्नत

डॉ.मंजूलता मौर्या 
मुंबई(महाराष्ट्र)
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मातृ दिवस स्पर्धा विशेष…………


नन्हीं-सी गुड़िया बनकर जब मैंने ली अंगड़ाई,
तेरे आँचल में ही माँ,मैंने सारी खुशियाँ पाई
मेरे सपने तेरी आँखों में सजते थे…
हर पल लगते जहाँ खुशियों के मेले थे।

नन्हें होंठों से जब भी मैं हँसती थी,
तेरे होंठों पर भी भोली-सी हँसीं खिलती थी
और कभी आँखों से मेरी छलक जाते जो आँसू,
अपनी आँखों में तू उसे भी भर लेती थी।

गमगीन पलों में भी माथे पर शिकन न दिखाई,
दिल में छिपाकर सारे गम, हर पल तू मुस्कराती रही
हर आँधी से बचाया मुझे सीने से लगाकर,
बनी तू ढाल मेरी,चाहे खुद घायल होती रही।

जीवन की धूप में खड़ी रही आँचल की छाँव लिए,
तो कभी मायूसी के अंधेरे में,बन गई धूप मेरे लिए
मैं हैरान हूँ…इतनी हिम्मत तू कहाँ से लाई,
तेरे आँचल के तले,हर पल मेरी जिंदगी मुस्कराई…l

सच कहते हैं…
तेरी सूरत से अलग भगवान की सूरत क्या होगी…?
तेरी ममता से अलग और कोई जन्नत क्या होगी…?

परिचय-डॉ.मंजूलता मौर्या का निवास नवी मुंबई स्थित वाशी में है। साहित्यिक उपनाम-मंजू है। इनकी जन्म तारीख-१५ जुलाई १९७८ एवं जन्मस्थान उत्तरप्रदेश है। महाराष्ट्र राज्य के शहर वाशी की डॉ.मौर्या की शिक्षा एम.ए.,बी.एड.(मुंबई)तथा पी.एच-डी.(छायावादोत्तर काव्य में नारी चित्रण)है। निजी महाविद्यालय में आपका कार्य क्षेत्र बतौर शिक्षक है। आपकी  लेखन विधा-कविता है। विशेष उपलब्धि शिक्षकों के लिए एक प्रकाशन की ओर से आयोजित निबंध प्रतियोगिता में पुरस्कृत होना है। मंजू जी के लेखन का उद्देश्य-चंचल मन में उठने वाले विविध विचारों को लोगों तक पहुँचाकर हिंदी भाषा की सेवा करना है।