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माँ

सुरेश चन्द्र सर्वहारा
कोटा(राजस्थान)
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घुट-घुटकर अब जी रही,बहा आँख का नीर,
माँ तो निर्धन हो गई,बेटे हुए अमीर।

बेटे की कोठी बनी,रखे किरायेदार,
छप्पर में अब रह रही,बूढ़ी माँ लाचार।

आज खड़ा वह पैर पर,आँके सबका दाम,
चलना सीखा जो कभी,माँ की उँगली थाम।

बच्चे घर से दूर तो,माँ को होती पीर,
रूठे रह कुछ पास भी,मन को देते चीर।

जग में अब किससे कहे,अपने मन की पीर,
सुबक उठी माँ पोंछकर,मृत पति की तस्वीर।

पूँजी बेटों-बीच में,अपनी सारी बाँट,
घोर निराशा-धुंध को,माँ रहती अब छाँट।

वृद्धाश्रम में छोड़कर,किया न माँ को याद,
नाम रखा घर का मगर,’माँ का आशीर्वाद॥’

परिचय-सुरेश चन्द्र का लेखन में नाम `सर्वहारा` हैl जन्म २२ फरवरी १९६१ में उदयपुर(राजस्थान)में हुआ हैl आपकी शिक्षा-एम.ए.(संस्कृत एवं हिन्दी)हैl प्रकाशित कृतियों में-नागफनी,मन फिर हुआ उदास,मिट्टी से कटे लोग सहित पत्ता भर छाँव और पतझर के प्रतिबिम्ब(सभी काव्य संकलन)आदि ११ हैं। ऐसे ही-बाल गीत सुधा,बाल गीत पीयूष तथा बाल गीत सुमन आदि ७ बाल कविता संग्रह भी हैंl आप रेलवे से स्वैच्छिक सेवानिवृत्त अनुभाग अधिकारी होकर स्वतंत्र लेखन में हैं। आपका बसेरा कोटा(राजस्थान)में हैl