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मानवता के सामने सबसे बड़ा खतरा ?

डॉ. शैलेश शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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कुछ वर्ष पहले तक दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा परमाणु बम को माना जाता था। आज भी यदि किसी देश के पास परमाणु हथियार हैं, तो दुनिया चिंतित हो जाती है लेकिन अब एक नई शक्ति तेजी से विकसित हो रही है, जिसका नाम है कृत्रिम मेधा (एआई)। यह तकनीक हमारे मोबाइल फोन, कम्प्यूटर, अस्पतालों, विद्यालयों, बैंकों, कारखानों और सरकारी दफ्तरों तक पहुँच चुकी है। यह हमारे काम को आसान बना रही है, लेकिन इसके साथ अनेक नए प्रश्न भी खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भविष्य में एआई परमाणु बम से भी बड़ा खतरा बन सकता है ?
इस प्रश्न का उत्तर देने से पहले यह समझना आवश्यक है, कि दोनों की प्रकृति अलग-अलग है। परमाणु बम एक हथियार है, जिसका उद्देश्य विनाश करना है। इसके विपरीत ए.आई  एक तकनीक है, जिसे मनुष्य ने अपनी सहायता के लिए बनाया है। इसका उपयोग चिकित्सा, शिक्षा, कृषि, उद्योग, शोध, पत्रकारिता और अनेक अन्य क्षेत्रों में हो रहा है। इसलिए, यह कहना उचित नहीं होगा कि ए.आई. अपने-आपमें कोई बुरी चीज है। असली प्रश्न यह है, कि इसका उपयोग किस उद्देश्य से और किस प्रकार किया जाता है।
  परमाणु बम का नुकसान सभी को दिखाई देता है। यदि उसका प्रयोग हो जाए तो कुछ ही क्षणों में भारी तबाही मच सकती है। लोगों की जान चली जाती है, इमारतें नष्ट हो जाती हैं और पर्यावरण भी लंबे समय तक प्रभावित रहता है। इसलिए, दुनिया के अधिकांश देशों ने ऐसे हथियारों के उपयोग को रोकने के लिए अनेक नियम बनाए हैं। परमाणु हथियार बहुत कम देशों के पास हैं और उन पर कड़ा नियंत्रण भी रहता है।
ए.आई. की स्थिति इससे बिल्कुल अलग है। यह किसी एक देश या संस्था तक सीमित नहीं है। आज दुनियाभर में करोड़ों लोग इसका उपयोग कर रहे हैं। कोई छात्र पढ़ाई के लिए इसका सहारा ले रहा है, कोई चिकित्सक रोगों की जानकारी प्राप्त करने के लिए इसका उपयोग कर रहा है, कोई किसान खेती से जुड़ी जानकारी ले रहा है और कोई लेखक अपने काम में सहायता प्राप्त कर रहा है। यही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी।
   ए.आई. का सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है, कि वह अचानक दुनिया को नष्ट कर देगा। वास्तविक चिंता यह है, कि यदि इसका गलत उपयोग होने लगे तो समाज को धीरे-धीरे बहुत बड़ा नुकसान पहुँच सकता है। उदाहरण के लिए आज ऐसी तकनीक उपलब्ध है, जिससे किसी व्यक्ति की नकली आवाज़ बनाई जा सकती है, उसका झूठा वीडियो तैयार किया जा सकता है या उसके नाम से गलत बातें फैलाई जा सकती हैं। यदि इन साधनों का उपयोग चुनावों, सामाजिक विवादों या किसी व्यक्ति की छवि खराब करने के लिए किया जाए तो समाज में भ्रम और अविश्वास फैल सकता है।
        आज सूचना पहले से कहीं अधिक तेजी से फैलती है। यदि गलत सूचना ए.आई. की सहायता से तैयार होकर लाखों लोगों तक पहुँच जाए, तो उसे रोकना आसान नहीं होता। लोग बिना जाँच किए उस पर विश्वास कर लेते हैं। इससे समाज में तनाव बढ़ सकता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था भी प्रभावित हो सकती है। इसलिए ए.आई. के इस पक्ष को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।
रोजगार के क्षेत्र में भी ए.आई. का प्रभाव दिखाई देने लगा है। कई ऐसे कार्य हैं, जिन्हें अब कम्प्यूटर पहले की तुलना में अधिक तेजी से कर सकते हैं। इससे लोगों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी नौकरियाँ समाप्त हो जाएँगी। इतिहास बताता है कि जब भी नई तकनीक आती है, कुछ पुराने काम कम हो जाते हैं और नए प्रकार के काम शुरू होते हैं। इसलिए, आवश्यकता इस बात की है कि लोग समय के साथ नए कौशल सीखें और बदलती तकनीक के अनुसार स्वयं को तैयार करें।
शिक्षा के क्षेत्र में भी ए.आई. नई संभावनाएँ लेकर आया है। विद्यार्थी कठिन विषयों को आसानी से समझ सकते हैं। शिक्षक पढ़ाने के नए तरीके अपना सकते हैं, लेकिन यदि विद्यार्थी बिना सोचे-समझे हर उत्तर ए.आई. से लेने लगेंगे, तो उनकी अपनी सोचने और समझने की क्षमता कमजोर हो सकती है। शिक्षा का उद्देश्य केवल उत्तर प्राप्त करना नहीं, बल्कि सही ढंग से सोचने की क्षमता विकसित करना भी है। इसलिए, ए.आई. को शिक्षक का विकल्प नहीं, बल्कि सहायक के रूप में देखना चाहिए।
पत्रकारिता में भी ए.आई. का उपयोग तेजी से बढ़ रहा है।     समाचारों का अनुवाद, आँकड़ों का विश्लेषण और सामान्य रिपोर्ट तैयार करने जैसे कार्य अब पहले की तुलना में अधिक तेजी से हो सकते हैं, लेकिन समाचार की सच्चाई की जाँच, घटनाओं का सही संदर्भ और समाज के प्रति नैतिक जिम्मेदारी आज भी मनुष्य ही निभा सकता है। यदि केवल मशीनों के भरोसे समाचार तैयार होने लगें, तो गलत सूचना फैलने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए, पत्रकारिता में मानवीय विवेक हमेशा सबसे महत्वपूर्ण रहेगा।
सुरक्षा के क्षेत्र में भी ए.आई. का उपयोग बढ़ रहा है। आधुनिक तकनीक से लैस उपकरण सीमाओं की निगरानी कर सकते हैं, आपदाओं की जानकारी जल्दी दे सकते हैं और बचाव कार्यों में सहायता कर सकते हैं, पर यदि यही तकनीक गलत हाथों में चली जाए, तो उसका दुरुपयोग भी संभव है। इसलिए तकनीक जितनी शक्तिशाली होती है, उसके लिए उतनी ही मजबूत जिम्मेदारी और नियमों की आवश्यकता होती है।
यह भी सच है, कि एआई ने समाज को अनेक लाभ दिए हैं। अस्पतालों में रोगों की पहचान पहले से अधिक तेजी से हो रही है। किसान मौसम और फसल से जुड़ी उपयोगी जानकारी प्राप्त कर रहे हैं। दिव्यांग लोगों के लिए नई सुविधाएँ विकसित हुई हैं। सरकारी सेवाओं को अधिक सरल और तेज बनाने में भी ए.आई. मदद कर रहा है। यदि इसका उपयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाए तो यह मानव जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बना सकता है।
आज सबसे बड़ी आवश्यकता यह है, कि ए.आई. का विकास केवल तकनीकी दृष्टि से नहीं, बल्कि नैतिक दृष्टि से भी किया जाए। इसके उपयोग में पारदर्शिता हो, लोगों की निजता सुरक्षित रहे, किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो और अंतिम महत्वपूर्ण निर्णयों में मनुष्य की भूमिका बनी रहे। केवल मशीनों पर पूरी तरह निर्भर समाज सुरक्षित नहीं माना जा सकता।
सरकारों, वैज्ञानिकों, शिक्षकों, उद्योगों और समाज को मिलकर ऐसे नियम बनाने होंगे, जिनसे ए.आई. का लाभ सभी तक पहुँचे और उसका दुरुपयोग रोका जा सके। लोगों को भी डिजिटल साक्षरता बढ़ानी होगी, ताकि वे सही और गलत जानकारी में अंतर समझ सकें। तकनीक तभी उपयोगी होती है, जब उसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी हो।
यह कहा जा सकता है, कि परमाणु बम और ए.आई. की तुलना सीधे-सीधे नहीं की जा सकती। परमाणु बम कुछ ही क्षणों में जान और संपत्ति का विनाश कर सकता है। ए.आई. ऐसा हथियार नहीं है, लेकिन यदि इसका गलत उपयोग किया जाए, तो यह धीरे-धीरे समाज, अर्थव्यवस्था, लोकतंत्र, शिक्षा और लोगों के आपसी विश्वास को कमजोर कर सकता है। इसलिए सबसे बड़ा खतरा तकनीक नहीं, बल्कि उसका गैर-जिम्मेदार उपयोग है। यदि मनुष्य विवेक, नैतिकता और जिम्मेदारी के साथ एआई का उपयोग करेगा, तो यही तकनीक मानव विकास का सबसे बड़ा साधन बन सकती है। यदि लालच, स्वार्थ और गलत इरादों के साथ इसका प्रयोग किया गया, तो यह आने वाले समय में गंभीर समस्याओं का कारण भी बन सकती है। इसलिए, आज आवश्यकता एआई से डरने की नहीं, बल्कि उसे समझदारी और जिम्मेदारी के साथ अपनाने की है।