पटना (बिहार)।
कम शब्दों में लयात्मकता और सशक्त काव्य-बिंबों के माध्यम से बड़ी बात कह जाना सार्थक कविता की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता मानी जाती है, किंतु आज अधिकांश रचनाकार सपाट कविता लिख रहे हैं, जिसके कारण कविता धीरे-धीरे पाठकों से दूर होती जा रही है। डॉ. शरद नारायण खरे की कविताओं में जीवन, समाज, राष्ट्र और मानवीय संवेदनाओं के अनेक रंग एकसाथ दिखाई देते हैं।
यह बात वरिष्ठ साहित्यकार कवि सिद्धेश्वर ने सम्मेलन का संचालन करते हुए कही। अवसर रहा भारतीय युवा साहित्यकार परिषद एवं अवसर साहित्य यात्रा के तत्वावधान में ‘अवसर कविता सप्ताह’ के समापन और कवि सम्मेलन का, जो आभासी माध्यम से किया गया। प्रारंभ में वरिष्ठ कवि डॉ. खरे ने अपनी कविताओं का प्रभावशाली पाठ किया। उनकी पंक्तियाँ-‘दिल छोटे, पर मकाँ हैं बड़े, सारे भाई न्यारे। अपने तक सीमित हैं सारे, नहीं परस्पर प्यारे॥’ श्रोताओं द्वारा विशेष रूप से सराही गईं।
दूसरे सत्र में डॉ. खरे, अनुज प्रभात, सिद्धेश्वर, संतोष मालवीय तथा राज प्रिया रानी आदि ने रचनाओं का प्रभावशाली पाठ किया। कार्यक्रम के अध्यक्ष ने सभी कविताओं की सटीक एवं सार्थक समीक्षा करते हुए कहा कि कविता में चेतना का होना अनिवार्य है। चेतना के बिना कविता अपना प्रभाव खो देती है।
प्रभारी अनुज प्रभात ने आभार व्यक्त किया।