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मैं रहूँ न रहूँ

उमा विश्वकर्मा
कानपुर (उत्तर प्रदेश)
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मैं रहूँ न रहूँ,देश प्यारा रहे,
आँसमा में तिरंगा,हमारा रहे
आन-बान-शान,ऐसे ही बढ़ती रहे,
विश्व में मुल्क अपना दुलारा रहे।

तन समर्पित तुम्हें,मन समर्पित तुम्हें,
जिंदगी के सभी,पल हैं अर्पित तुम्हें
जब तलक जिस्म में श्वांस है आख़िरी,
कतरा-कतरा लहू,इस धरा में बहे।

देश के दुश्मनों,ध्यान से तुम सुनो,
जाल षड्यंत्र के,तुम जरा मत बुनो
अब न पाओगे बच,छोड़ दो अपनी हठ,
माना बच के अभी तक,निकलते रहे।

घात पर घात की,लूट और पाट की,
बनके बहरूपिया,तुमने उत्पात की
अब तलक कोई हमको मिटा न सका,
जड़ बने और धरा में सदा हम रहे।

छोड़ ईमान को,बेच सम्मान को,
खड्ड में जा गिरे,आज नादान वो
अब सफ़र में अँधेरा मिलेगा उन्हें,
जो उजाले को अँधियारा कहते रहे।

दुश्मनों तुम डरो,फ़िक्र अपनी करो,
ऐसा न हो कि कल,खामियाज़ा भरो
मुश्किलों से निकलना भी आता हमें,
वार पर वार हमने हजारों सहे।

हमने छीना नहीं,बस दिया ही दिया,
विष कुटिल चाल का हमने अक्सर पिया।
ढाये जिसने सितम,उसको छोड़ें क्यों हम,
ये उबलता लहू आज मुझसे कहे॥

परिचय-उमा विश्वकर्मा की जन्म तारीख १९ मार्च १९६९ व जन्म स्थान कानपुर नगर है। आपको हिंदी भाषा का ज्ञान है। उत्तर प्रदेश के शहर कानपुर निवासी उमा विश्वकर्मा ने एम.ए.(हिंदी साहित्य),एल.एल.बी.(विधि स्नातक)वा सी.पी.एल. (डिप्लोमा इन उपभोक्ता फोरम )की शिक्षा हासिल की है। कार्यक्षेत्र में स्वरोजगार करने वाली उमा
विश्वकर्मा अनेक सामाजिक गतिविधि में सक्रिय हैं। इनकी लेखन विधा-कहानी,कविता और लेख है। कोलाहल (कथा संग्रह),धुआं बरक़रार है (काव्य संग्रह)) और गुनगुनी धूप ( काव्य संग्रह )किताब आपके खाते में दर्ज हैं। आपकी रचनाएं अनेक पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार की बात की जाए तो आपको लक्ष्मीदेवी ललित कला अकादमी पुरस्कार,विकासिका साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था पुरस्कार,उत्कृष्ट रचनाकार पुरस्कार (३ बार),साहित्य समज्या पुरस्कार एवं समय-समय पर विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मान प्राप्ति है। उद्देश्यपूर्ण जीवन को विशेष उपलब्धि मानने वाली उमा विश्वकर्मा की लेखनी का उद्देश्य- आत्म आनन्द और आर्थिक सुरक्षा है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-प्रेमचंद्र,मंटो,अमृता प्रीतम,साहिर, सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’,कबीर दास,दुष्यंत कुमार,नागार्जुन,महादेवी वर्मा,रामधारी सिंह ‘दिनकर’ एवं मनोज मुन्तशिर हैं। प्रेरणापुंज-दुष्यंत कुमार हैं। इनकी विशेषज्ञता-वकालत है तो जीवन का लक्ष्य-देश और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-‘सबसे पहले देश है,उसके बाद हम हैं। हिंदी भाषा से मुझे विशेष लगाव है। इसके माध्यम से हम अपनी भावनाओं को जन-जन तक प्रेषित कर सकते हैं।’

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