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यात्रा

बोधन राम निषाद ‘राज’ 
कबीरधाम (छत्तीसगढ़)
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अनजानी गर हो डगर,यात्रा क्या आसान।
सोच-समझ पग धारिए,मंजिल को पहचान॥
मंजिल को पहचान,भटकना नहीं पड़ेगा।
साथी मेरे यार,जमाना साथ चलेगा॥
कहे ‘विनायक राज’,नहीं करना मनमानी।
एक नहीं तुम साथ,चलो जग है अनजानी॥

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