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राष्ट्रहित में…

डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
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“यह सरकार भी क्या चीज है… पहले पीने की आदत डालकर पियक्कड़ बना देती है, फिर शराब पर टैक्स पर टैक्स लगाकर उसे महंगी करती चली जाती है…! सत्यानाश हो इसका!”
   “तेरी तो आदत ही है ‘नेगेटिव’ बात करने की… कभी  ‘पॉजिटिव’ बात भी किया कर…।”
   “…. तो तू ही बता, मैंने क्या गलत कहा ?”
“कहा तो तूने सही है, मगर यह भी तो सोच कि हम शराब प्रेमियों के लिए सरकार ने चार-चार कदम पर इसकी दुकानें खोल दी हैं… पहले हम लोग इधर-उधर बैठकर बोतल खोला करते थे, पर अब देखो कितने अच्छे अहाते में बैठकर जाम से जाम टकरा रहे हैं।”
  “…हाँ यार… यह बात तूने अच्छी‌ कही। अहाते मैं बैठकर पीने का मजा कुछ और ही है… अरे! देख सामने सड़क पर लोग  हाथ में तख्ती लेकर नारे लगा रहे और नारा भी क्या लगा रहे…’सरकार का एक ही नारा-नशा मुक्त हो देश हमारा’।”
“हाँ यार, आज अखबार में मैंने पढ़ा था कि मंत्री जी, कलेक्टर साहब युवाओं को नशे से दूर रहने की शपथ दिलवाएंगे। यह लड़के- लड़कियाँ वहीं जा रहे… परेड ग्राउंड में!”
“इन दो मुँहे नेताओं ने सारा देश ही चौपट करके रख दिया…!”
“हाँ यार… साले कहते कुछ और हैं… करते कुछ और हैं!”
  “… गौर करना, आज देश में हर कोई दोहरी बात कर रहा… खास तौर पर नेता लोग… यह नारा सुनकर मेरा तो सारा मूड ही खराब हो गया। मूड बनाने के लिए आज और पीनी पड़ेगी भाई!”
“यह तो बहुत अच्छी बात है शराब पीना तो आजकल राष्ट्रहित में माना जा रहा है!”
“क्यों यार ऐसा क्यों कह रहे हो ?”
“ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ कि अखबार वाले लिख रहे हैं कि शराब के टैक्स से ही सरकारें चल रही हैं… नेताओं के एश-ओ-आराम चल रहे हैं!”