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राष्ट्र प्रेम और अनोखे बलिदान को याद करना जरूरी

डॉ.अरविन्द जैन
भोपाल(मध्यप्रदेश)
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विश्व आदिवासी अंतर्राष्ट्रीय (९ अगस्त) दिवस विशेष…

   आदिवासी शब्द २ शब्दों 'आदि' और 'वासी' से मिल कर बना है, जिसका अर्थ ‘मूल निवासी’ होता है। भारत में लगभग ७०० आदिवासी समूह व उप-समूह हैं। इनमें लगभग ८० प्राचीन आदिवासी जातियां हैं। भारत की जनसंख्या का ८.६ फीसदी (१० करोड़) जितना एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है।
 पुरातन संस्कृत ग्रंथों में आदिवासियों को ‘अत्विका’ एवं महात्मा गांधी ने आदिवासियों को गिरिजन (पहाड़ पर रहने वाले लोग) से संबोधित किया। भारतीय संविधान में आदिवासियों के लिए 'अनुसूचित जनजाति' पद का उपयोग किया गया है।
   आदिवासियों के पास आपदा, रक्षा और विकास का अद्भुत ज्ञान है। ऐतिहासिक पुस्तकों एवं ग्रन्थों में इस बात का उल्लेख मिलता है कि, कैसे मुगल या अंग्रेज पूरे भारत पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लेते हैं, लेकिन जब आदिवासी क्षेत्रों में प्रवेश करने की सोचते हैं, तो उन्हें मुँह की खानी पड़ती है। इसी प्रकार अंडमान के जरवा आदिवासी द्वारा 'सुनामी' जैसी भयानक प्राकृतिक आपदा में भी खुद को बचा लेने एवं इसका अंदेशा लगा लेने कि कोई भयानक प्राकृतिक आपदा आने वाली है, ने इस क्षेत्र के लोगों को यह विश्वास दिलाया कि आदिवासियों के पास आपदा की अद्भुत समझ है। इसी प्रकार आदिवासी समाज में मदद की एक परम्परा है, जिसे ‘हलमा’ कहते हैं। इसके अंतर्गत जब कोई व्यक्ति या परिवार संपूर्ण प्रयासों के बाद भी खुद पर आए संकट से उबरने में असमर्थ होता है, तब उसकी मदद के लिए सभी ग्रामीण जुटते हैं, और अपने नि:स्वार्थ प्रयत्नों से उसे मुश्किल से बाहर निकालते हैं। यह एक ऐसी गहरी और उदार परम्परा है, जिसमें संकट में फंसे व्यक्ति की सहायता की जाती है। यह चर्चा में तब आई, जब २०१८ में देश में भयानक जलसंकट को देखते हुए आदिवासियों ने 'हलमा' का आह्वान धरती माँ के लिए किया।

लोक चिकित्सा ज्ञान भी आदिवासियों का महत्वपूर्ण परम्परागत ज्ञान है, जिसका सामुदायिक उपयोग होता है। इसे समाज के उन सदस्यों की स्वीकृति प्राप्त होती है, जो अपने अनुभवों के आधार पर इसे स्थापित किए होते हैं। आधुनिक चिकित्सा पद्धति इसे अव्यवस्थित चिकित्सा ज्ञान कहती है, पर लोक चिकित्सकीय ज्ञान का व्यक्ति के अंतरीकरण की प्रक्रिया से सम्बन्ध होता है एवं इसकी सबसे जरूरी शर्त इसका हस्तांतरित होते रहना होता है। यही इस ज्ञान की ताकत भी है। आदिवासियों ने अपने ज्ञान का उपयोग सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए किया। आजादी के आंदोलन में उनके योगदान को याद करना निश्चित ही ‘आजादी के अमृत महोत्सव’ को पूर्ण करेगा। आदिवासियों का राष्ट्र के प्रति वह अमृत भाव ही था, जिसने सिद्दू और कान्हू, तिलका और मांझी, बिरसा मुंडा इत्यादि वीर योद्धाओं को जन्म दिया।
आज जब देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है;आजादी के नायकों को याद कर रहा है, ऐसे में यह भी जरूरी है कि आदिवासियों के राष्ट्र प्रेम और इस प्रेम में दिए उनके अनोखे बलिदान को भी याद किया जाए। १७९० का ‘दामिन विद्रोह’, १८२८ का ‘लरका आन्दोलन’ व १८५५ का संथाल का विद्रोह, यह सभी ऐसे आंदोलन रहे, जिसमें बड़ी संख्या में आदिवासियों ने अपना बलिदान दिया। आदिवासियों या वनवासियों की अपनी मिट्टी के प्रति प्रतिबद्धता ही राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता और सम्मान है। आदिवासी राष्ट्र को सिर्फ स्वतंत्र ही नहीं, बल्कि जागृत करने का काम भी अपने लोक संचार माध्यम के जरिए करते रहे हैं। बंगला लोक नाट्य ‘जात्रा’ का उपयोग स्वतन्त्रता संघर्ष में और लोकगान के परम्परा गत रूप ‘पाला’ का उपयोग भी जनजागरूकता एवं स्वतन्त्रता आंदोलन में किया गया। ऐसे कई उदाहरण इतिहास में मिलते हैं, जहां लोक संचार माध्यम के जरिए आदिवासियों ने आजादी की अलख जगाए रखी।
आदिवासियों की यह देशज ज्ञान परम्परा देश-दुनिया के लिए सशक्त समाधान का माध्यम बन सकती है। जरूरत है इस देशज ज्ञान को चिह्नित कर इसे वैज्ञानिक मान्यता देने की। देश के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने कहा था कि यदि वाकई हमें विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना है, तो देश में वैज्ञानिक शोध के अवसरों को न केवल आसान करने की जरूरत है, बल्कि भारत के अशिक्षित ग्रामवासी या सामान्य जन जो आविष्कार कर रहे हैं, उन्हें भी वैज्ञानिक मान्यता देकर उपयोग करने की जरूरत है।
हर वर्ष ‘विश्व आदिवासी दिवस’ आबादी के अधिकारों को बढ़ावा देने और उनकी सुरक्षा के लिए ९ अगस्त को मनाया जाता है। यह घटना उन उपलब्धियों और योगदानों को भी स्वीकार करती है, जो मूलनिवासी लोग पर्यावरण संरक्षण जैसे विश्व के मुद्दों को बेहतर बनाने के लिए करते हैं। यह पहली बार संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा दिसंबर १९९४ में घोषित किया गया था। खासकर इसे भारत के आदिवासियों द्वारा धूमधाम से मनाया जाता है।

परिचय- डॉ.अरविन्द जैन का जन्म १४ मार्च १९५१ को हुआ है। वर्तमान में आप होशंगाबाद रोड भोपाल में रहते हैं। मध्यप्रदेश के राजाओं वाले शहर भोपाल निवासी डॉ.जैन की शिक्षा बीएएमएस(स्वर्ण पदक ) एम.ए.एम.एस. है। कार्य क्षेत्र में आप सेवानिवृत्त उप संचालक(आयुर्वेद)हैं। सामाजिक गतिविधियों में शाकाहार परिषद् के वर्ष १९८५ से संस्थापक हैं। साथ ही एनआईएमए और हिंदी भवन,हिंदी साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। आपकी लेखन विधा-उपन्यास, स्तम्भ तथा लेख की है। प्रकाशन में आपके खाते में-आनंद,कही अनकही,चार इमली,चौपाल तथा चतुर्भुज आदि हैं। बतौर पुरस्कार लगभग १२ सम्मान-तुलसी साहित्य अकादमी,श्री अम्बिकाप्रसाद दिव्य,वरिष्ठ साहित्कार,उत्कृष्ट चिकित्सक,पूर्वोत्तर साहित्य अकादमी आदि हैं। आपके लेखन का उद्देश्य-अपनी अभिव्यक्ति द्वारा सामाजिक चेतना लाना और आत्म संतुष्टि है।