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विकास की वातानुकूलित आत्महत्या

डॉ. शैलेश शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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मनुष्य बड़ा बुद्धिमान प्राणी है। इतना बुद्धिमान, कि उसने अपने जीवन को आरामदायक बनाने के लिए ऐसी-ऐसी चीज़ें बना डालीं, जिनसे अंततः उसका जीवन ही असुविधाजनक होने लगा। यह वही प्राणी है, जो पहले पेड़ के नीचे बैठकर ठंडी हवा खाता था, फिर उसने पेड़ काटकर वहाँ इमारत बनाई, इमारत गर्म हो गई तो वातानुकूलित यंत्र लगा लिया, फिर उस यंत्र से धरती और गर्म हो गई, फिर उसने और बड़े वातानुकूलित यंत्र खरीद लिए। यानी समस्या भी खुद पैदा करो और फिर उसी समस्या से बचने के लिए नई समस्या खरीद लो—यही आधुनिक विकास का मूल मंत्र है।
आज मनुष्य ‘सुख-सुविधाओं’ का ऐसा साधक बन चुका है, कि उसे अब प्रकृति सिर्फ तस्वीरों में अच्छी लगती है। असली पेड़ से ज्यादा आनंद उसे मोबाइल के पर्दे पर लगे ‘प्रकृति वाले चित्र’ में आता है। पक्षियों की आवाज़ अब उसे सुबह की मधुर ध्वनि नहीं, बल्कि नींद खराब करने वाला शोर लगती है। नदियाँ उसे तब तक अच्छी लगती हैं, जब तक उनके किनारे बहुमंजिला परियोजनाएँ न बन जाएँ।
  मनुष्य ने विकास को एक ऐसी दौड़ बना दिया है, जिसमें वह स्वयं ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं, पूरा बुलडोजर चला रहा है। पहले जंगल काटे गए ताकि सड़कें बन सकें। फिर सड़कें इतनी गर्म हो गईं कि उनके किनारे कृत्रिम हरियाली लगाने की योजना बनाई गई। पहले नदियों को गंदा किया गया, फिर ‘स्वच्छ नदी अभियान’ चलाया गया। पहले हवा को जहरीला बनाया गया, फिर हवा शुद्ध करने वाली मशीनें खरीदी गईं। यानी पहले बीमारी पैदा करो, फिर इलाज बेचो—यही आधुनिक सभ्यता की सबसे सफल व्यापार नीति है।
आज का मनुष्य प्रकृति को माँ नहीं, ‘खाली पड़ी जमीन’ समझता है। जहाँ पेड़ दिखा, वहाँ उसे भविष्य का शो-रूम दिखाई देता है। जहाँ पहाड़ दिखा, वहाँ होटल और रिसॉर्ट का सपना आने लगता है। जहाँ नदी बहती है, वहाँ उसे जल नहीं, ‘वाटरफ्रंट प्रोजेक्ट’ दिखाई देता है। प्रकृति उसके लिए अब जीवन का आधार नहीं, ‘व्यावसायिक संभावना’ बन चुकी है।
विडम्बना देखिए—मनुष्य अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य बनाना चाहता है, इसलिए वह दिन-रात विकास कर रहा है, लेकिन उसी विकास में वह बच्चों के हिस्से की हवा, पानी और हरियाली धीरे-धीरे खत्म करता जा रहा है। वह अपने बच्चे को महंगे विद्यालय में पढ़ा रहा है, लेकिन यह भूल रहा है कि जिस ग्रह पर वह बच्चा साँस लेगा, वही धीरे-धीरे दम तोड़ रहा है।
आज शहरों में बड़े गर्व से कहा जाता है—“यहाँ चौबीस घंटे बिजली है।”, लेकिन यह कोई नहीं पूछता कि उस बिजली के लिए कितने जंगल जले, कितनी नदियाँ सूखी और कितनी पहाड़ियाँ खोखली हुईं। हम चमकती रोशनी देखकर खुश हैं, पर यह नहीं देखना चाहते कि उसी रोशनी में तारों भरा आकाश गायब हो गया।
  आधुनिक मनुष्य का प्रकृति प्रेम भी बड़ा रोचक है। सप्ताह भर वह धुआँ फैलाता है, प्लास्टिक फेंकता है, पानी बर्बाद करता है, और रविवार को ‘पर्यावरण बचाओ’ की टी-शर्ट पहनकर पौधरोपण करने निकल जाता है। पाँच पौधे लगाकर पचास तस्वीरें खिंचवाता है और फिर वातानुकूलित गाड़ी में बैठकर घर लौट आता है। रास्ते में एक प्लास्टिक की बोतल सड़क पर फेंकते हुए वह गर्व से सोचता है —“आज मैंने धरती के लिए कुछ अच्छा किया।”
   मनुष्य ने प्रकृति के साथ अपना संबंध भी पूरी तरह व्यावसायिक बना लिया है। अब बारिश भी उसे तभी अच्छी लगती है जब सप्ताहांत खराब न हो। धूप तभी पसंद है, जब वातानुकूलित कमरा उपलब्ध हो। ठंडी हवा तभी सुखद है, जब वह किसी महंगे पर्वतीय पर्यटन स्थल पर मिले। यानी प्रकृति को भी अब ‘पैकेज’ बनाकर उपभोग किया जा रहा है।
सबसे मजेदार बात यह है, कि हम जिस ‘विकास’ पर सबसे ज्यादा गर्व करते हैं, वही धीरे-धीरे हमारे जीवन को सबसे ज्यादा असुरक्षित बना रहा है। शहर इतने विकसित हो गए हैं कि बच्चों को असली मिट्टी छूने का अवसर नहीं मिलता। नदियाँ इतनी उपयोगी बना दी गई हैं कि उनमें जीवन बचा ही नहीं। हवा इतनी आधुनिक हो चुकी है कि अब उसे शुद्ध करने के लिए मशीन खरीदनी पड़ती है।
आज स्थिति यह है कि मनुष्य प्राकृतिक चीज़ों के लिए भी कृत्रिम उपाय खोज रहा है। घर में धूप नहीं आती, तो ‘विटामिन’ की गोली खाओ। पेड़ नहीं बचे, तो हवा साफ करने वाली मशीन खरीदो। नदी गंदी हो गई, तो बोतलबंद पानी पियो। यानी पहले प्रकृति नष्ट करो, फिर प्रकृति की नकल खरीदो।
  विकास का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है, कि मनुष्य आराम की तलाश में ऐसा जीवन बना रहा है जिसमें मानसिक तनाव, प्रदूषण, अकेलापन और बीमारियाँ लगातार बढ़ रही हैं। वह बड़ी गाड़ी खरीदकर खुश है, लेकिन उसी गाड़ी के धुएँ से उसकी साँसें कमजोर हो रही हैं। वह ऊँची इमारत बनाकर गर्व महसूस कर रहा है, लेकिन उसी इमारत के नीचे गर्म होती धरती उसे बेचैन कर रही है।
और यह सब इतनी तेजी से हो रहा है, कि मनुष्य को खुद समझ नहीं आ रहा कि वह विकास कर रहा है या धीरे-धीरे अपनी ही जीवन-व्यवस्था को समाप्त कर रहा है। वह अपने घर को सुंदर बनाने में लगा है, लेकिन जिस धरती पर वह घर खड़ा है, उसे रहने लायक कम करता जा रहा है।
सबसे दुखद बात यह है, कि प्रकृति कभी बदला नहीं लेती। वह केवल संतुलन बनाती है। लेकिन जब मनुष्य संतुलन बिगाड़ देता है, तब परिणाम बाढ़, सूखा, गर्मी, प्रदूषण और बीमारियों के रूप में लौटते हैं। तब मनुष्य आश्चर्य से पूछता है—“ऐसा क्यों हो रहा है ?”, जबकि उत्तर वही होता है जो वर्षों से उसके सामने खड़ा था—“क्योंकि तुमने सुविधा के लिए जीवन की जड़ों को ही काट दिया।”
   आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद यही है, कि उसने अपने लिए इतनी सुविधाएँ जुटा ली हैं कि अब उसे जीने के लिए प्राकृतिक हवा, स्वच्छ पानी और शांत वातावरण खरीदना पड़ रहा है। वह विकास के नाम पर धीरे-धीरे अपने ही अस्तित्व को गिरवी रख रहा है—और फिर भी गर्व से कह रहा है, “हम प्रगति कर रहे हैं।”
सच तो यह है, कि यदि विकास मनुष्य को प्रकृति से दूर ले जाकर बीमार, तनावग्रस्त और भयभीत बना दे, तो वह विकास कम और वातानुकूलित आत्महत्या ज्यादा लगता है।