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वीरों की धरती हिन्दुस्तान

शंकरलाल जांगिड़ ‘शंकर दादाजी’
रावतसर(राजस्थान) 
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वतन की शान है तो मेरी भी शान है,
वतन की आन रखना मेरा ईमान है।

वतन ही रब है मेरा ये मेरी जान है,
इस दुनिया में सिरमौर मेरा हिन्दुस्तान है।

वतन के वास्ते ही हम जियेंगे मरेंगे,
वतन का सिर कभी भी नीचा न करेंगें।

खाते हैं कसम देश को ऊँचा उठायेंगे,
नीले गगन में हर सूं तिरंगा फहरायेंगे।

आयेगा कोई ताकने टेढ़ी नजर को कर,
जालिम की आँखों में हम अंगारे देंगे भर।

भारत की संस्कृति को है जानता जहान,
सारा जहां भारत को है मानता महान।

गिरिराज हिमालय ही मुकुट है हमारा,
भारत के बीच बहती पतित पावनी धारा।

भारत के पत्थरों में ईश्वर का वास है,
करते हैं उनकी पूजा हमारा विश्वास है।

हम धर्म के आगे अपना सिर झुकाते हैं,
वतन की आबरू के लिये सिर कटाते हैं।

वीर शिवा राणा प्रताप अमरसिंह राठौड़,
हो गये कुर्बान देश पर रहते मूँछ मरोड़।

मंगल पांडे,तात्या टोपे लक्ष्मी-सी मर्दानी,
जान लुटा दी दुश्मन से हार कभी ना मानी।

राजगुरू,सुखदेव,भगत बने देह के दानी,
स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर दी सबने कुर्बानी।

बिस्मिल,शेखर अशफाक वीर सुभाष महान,
इनसे ही वीरों की धरती अपना हिन्दुस्तान।

और देश की सीमा पर हैं सन्नध प्रहरी रहते,
कष्ट अनेकों सह कर देश की रक्षा करते।

हम भारत के बेटे हैं हमको है अभिमान,
इसकी खातिर दे सकते हँसते-हँसते जान।

विश्वगुरू भारत ही होगा दुनिया कर ले ध्यान,
क्योंकि ये वीरों की धरती अपना हिन्दुस्तान॥

परिचय-शंकरलाल जांगिड़ का लेखन क्षेत्र में उपनाम-शंकर दादाजी है। आपकी जन्मतिथि-२६ फरवरी १९४३ एवं जन्म स्थान-फतेहपुर शेखावटी (सीकर,राजस्थान) है। वर्तमान में रावतसर (जिला हनुमानगढ़)में बसेरा है,जो स्थाई पता है। आपकी शिक्षा सिद्धांत सरोज,सिद्धांत रत्न,संस्कृत प्रवेशिका(जिसमें १० वीं का पाठ्यक्रम था)है। शंकर दादाजी की २ किताबों में १०-१५ रचनाएँ छपी हैं। इनका कार्यक्षेत्र कलकत्ता में नौकरी थी,अब सेवानिवृत्त हैं। श्री जांगिड़ की लेखन विधा कविता, गीत, ग़ज़ल,छंद,दोहे आदि है। आपकी लेखनी का उद्देश्य-लेखन का शौक है।