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सच्चा साहित्यकार वही, जो डरे बिना राष्ट्र निर्माण में योगदान दे

राधा गोयल
नई दिल्ली
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साहित्यकार देश के निर्माण में सबसे अधिक सहायक होता है। उसके कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है। उसकी कलम बहुत कुछ कर सकती है। वह चाहे तो देश को उन्नति के शिखर पर पहुंचा दे और चाहे तो पतन के गर्त में गिरा दे। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तो साहित्यकार को अपना दायित्व समझने की बहुत जरूरत है। आजकल बाजार में अश्लील साहित्य की इतनी भरमार हो रही है कि, युवा पीढ़ी उसे पढ़कर पतन के गर्त में गिर रही है। अश्लील फिल्मों की बाढ़ और मोबाईल की लत ने इसे और अधिक बढ़ावा दिया है। दूरदर्शन पर ढंग के धारावाहिक नहीं आते। हमें याद है किसी जमाने में जब श्वेत- श्याम टीवी होता था, तब रविवार के दिन ‘रामायण’ आती थी। उन दिनों गलियों में कर्फ्यू जैसा माहौल बन जाता था। सभी बच्चे-बूढ़े-युवा ‘रामायण’ देखते थे। बच्चों में तब संस्कार भी आए थे। ऐसे ही ‘बुनियाद’, ‘हम लोग’ और ‘तमस’ जैसे धारावाहिक आते थे। सभी लोग समारोह तक में जाना छोड़कर पहले नाटक देखते थे। आजकल तो ऐसे धारावाहिक या फिल्म आती ही नहीं हैं। अभी किसी ने ‘कश्मीर फाइल्स’ बनाई। कहते हैं ना कि पानी झील में ही मरता है, तो कुछ लोगों को बड़ी मिर्ची लगीं और विरोध शुरू हो गया। फिर ‘द केरल स्टोरी’ फिल्म आई। वह भी सच्चाई से प्रेरित थी। जिनके बारे में सच्चाई लिखी थी, उनने हंगामा शुरू कर दिया। साहित्यकार और सारे मानवतावादी संगठन मौन साध कर बैठे रहे। काश! ऐसे में कोई कबीर दोबारा से जन्म लेता और इन लोगों को आईना दिखाता। दोगले, सत्ता के लालची चाटुकारों को खरी-खरी सुनाता।

राजनीति का गन्दा खेल हर युग में चलता रहा है, आज भी चल रहा है। मत बैंक की खातिर जनता को बरगलाया जाता है। ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति आज भी कायम है। ऊपर से लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति का अन्धानुकरण। हम आज तक भी गुलाम मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं। आज ऐसे कर्तव्यनिष्ठ और देशप्रेमी साहित्यकारों की आवश्यकता है, जो ऐसी रचनाएँ लिखें, जिससे युवा पीढ़ी की आँखें खुलें। उनकी आँखों पर भ्रम का जो पर्दा पड़ा हुआ है, वह हट जाए। वे सपनों की रंगीन दुनिया से निकलकर यथार्थ की कठोरता को पहचानें। ऊपरी चमक-दमक की अपेक्षा मन की शुद्धता पर जोर दें।
कितने ही बरसों से विश्व में बुरी तरह से उठा-पटक मची हुई है। एक देश युद्ध की विभीषिका से बाहर निकल नहीं पाता कि, दूसरा युद्ध शुरू कर देता है। प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध से भी लोगों ने कोई सबक नहीं सीखा। उसके बाद वियतनाम में २० वर्ष तक संघर्ष चलता रहा। अफगानिस्तान, सीरिया, म्यांमार, रूस और यूक्रेन के मध्य युद्ध, वह अभी खत्म भी नहीं हुआ है कि अब मणिपुर में युद्ध जैसे हालात बन गए हैं और हमारे साहित्यकार ? उन्हें इस सबसे क्या मतलब। उनके लिए तो वह राजनीति का विषय है। साहित्यकार सोचता है कि, वह इस पचड़े में क्यों पड़े। मेरा काम है लेखन करना, ना कि दुनिया के बारे में सोचना। शायद वह भूल जाता है कि जिस देश में वह रहता है, उस देश के प्रति उसका भी कोई दायित्व है। अपनी माटी के प्रति भी उसका कोई दायित्व है। जिस देश की माटी में खेलकर वो बड़ा हुआ है, उस मातृभूमि के प्रति भी उसका कोई धर्म है। सुनते हैं कि साहित्यकार बहुत संवेदनशील होता है। अपने आसपास की अमानवीय घटनाएँ उसे विचलित करती हैं। तब उसकी कलम से शब्दों की निर्झरिणी खुद ही फूट पड़ती है। बिल्कुल वैसे, जैसे वेदव्यास ने महाभारत युद्ध का पूरा वृतांत लिखा था, ताकि दुनिया समझ पाए कि द्यूत का अंजाम क्या होता है।द्यूत किस तरह से एक महारानी की इज्जत को तार-तार कर सकता है। द्यूत के कारण किस तरह से भाइयों एवं पत्नी को भी दांव पर लगा दिया जाता है और फिर महाभारत होता है। उसी में राजा नल और दमयन्ती की भी कहानी है। नल ने भी अपने चाचा के लड़के के साथ जुआं खेला और उसमें राज-पाठ हार गया। बस इतना शुक्र था कि, उसने पत्नी को दांव पर नहीं लगाया।
आज हमारे देश में बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है। आरक्षण की आग सुलग रही है। जो कभी हमारे देश में शरणार्थी बनकर आए थे, आज हमें शरणार्थी बनाने पर तुले हुए हैं। ऐसे में साहित्यकार का क्या दायित्व है ? तटस्थ रहकर देखते रहना या ऐसी घटनाओं से विचलित व विगलित होकर ऐसी रचनाएँ लिखना, जो देश के युवकों में शौर्य-पराक्रम की मशाल जला सके ?
अभी सरकार ने कोशिश की कि, देश में एक समान आचार संहिता होनी चाहिए। होनी भी चाहिए, सबके लिए एक समान कानून क्यों ना हो। सभी समुदायों की महिलाओं को समान अधिकार मिलने चाहिए, लेकिन कुछ लोगों ने अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए प्रदर्शन और धरनेबाजी शुरू कर दी है। कुछ भले लोगों ने शांतिपूर्ण ढंग से सोशल मीडिया पर अभियान चलाया जिसमें पूछा गया कि ‘समान नागरिक संहिता’ के पक्ष में कौन-कौन है ?’ आम आदमी ने कोई बवाल नहीं मचाया और जो इसको अच्छा समझ रहे थे, उसके पक्ष में मत दिया, लेकिन कुछ इसके पक्ष में नहीं थे क्योंकि उनकी पुरुष सत्ता को चुनौती थी। मेरे जैसे कुछ लोगों ने कुछ साहित्यिक पटल पर उस जानकारी को डाला। बस जी, बवाल मच गया। भूल गए कि, साहित्यकार का दायित्व क्या होता है ? साहित्य समाज का आईना होता है। मुझे लज्जा आती है ऐसे लोगों को साहित्यकार कहते हुए, जिनको इन बातों में राजनीति की बू आती है। उन्हें इसमें देश का हित नजर नहीं आता। जनता का हित नजर नहीं आता। इस समान नागरिक कानून से कितने लोगों का हित होगा। श्रंगार की रचनाएं लिखते रहो, राष्ट्रधर्म क्या होता है, इसके बारे में कुछ मत बोलो, क्योंकि धर्म के बारे में बोलना बुरी बात है। कैसे साहित्यकार हैं ये ? ये साहित्यकार हैं या राष्ट्रद्रोही ?
हमारे देश की सीमाएँ चारों तरफ से दुश्मन देशों से घिरी हुई हैं। कितने अराजक तत्व इस देश को तोड़ने की कोशिशों में लगे हुए हैं। ऐसे में साहित्यकार का क्या फर्ज है ? मेरे हिसाब से देश के लोगों में देश प्रेम की अलख जगाना। ऐसा साहित्य लिखना, जिससे लोग देश के मायने समझ सकें। अपनी मिट्टी से जुड़ाव के मायने समझ सकें। यह काम कर सकता है तो केवल साहित्यकार। वह देश के निर्माण में शौर्य और पराक्रम की रचनाएँ लिख कर नए युग का निर्माण करने में योगदान दे सकता है। अपनी रचनाओं द्वारा लोगों को समझा सकता है कि, सबसे बड़ा धर्म क्या है। वह है मानवता। मानव का मानव से प्रेम, जीव का जीव से प्रेम। जिस दिन ऐसा हो जाएगा, धरती पर स्वर्ग आ जाएगा।
धर्म के नाम पर आज तक जितना खून बहा, वह अन्य किसी कारण से नहीं बहा। साहित्यकार अपनी लेखनी से सही क्या है, गलत क्या है, यह बता सकता है। यही उसका दायित्व भी है। हालांकि, हमने विश्व में बहुत ख्याति अर्जित कर ली है और हमारा देश फिर से विश्व गुरु बन चुका है, लेकिन कुछ लोगों को यह सब हजम नहीं हो रहा है और वह इस देश के टुकड़े-टुकड़े करना चाह रहे हैं। इस बात के लिए किसी साहित्यिक मंच पर कुछ कहा जाए तो कहते हैं कि, यहाँ ऐसी बातें न की जाएँ।
आजकल देश में अप संस्कृति खेल रही है। लोग अपनी भाषा, भूषण, संस्कार एवं संस्कृति को भूल रहे हैं। पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण की दौड़ में लगे हुए हैं, लेकिन इन सबको जागरूक करने में… हृदय परिवर्तन करने में एक साहित्यकार का बहुत बड़ा योगदान हो सकता है।

साहित्यकार… अपनी लेखनी द्वारा लोगों की सुप्त चेतना को जागृत करके एक नए युग का निर्माण कर सकता है। कलम की ताकत ने न जाने कितनी बार युग परिवर्तन किए हैं। हालाँकि, सत्य लिखने वालों को सूली पर भी लटकाया जाता है। उन्हें डराया जाता है, लेकिन सच्चा साहित्यकार वही है जो इन सब बातों से बिना डरे केवल राष्ट्र निर्माण में अपना योगदान दे। वर्तमान समय में साहित्यकार के कन्धों पर बहुत बड़ा उत्तरदायित्व है, जिसे निभाना एक सच्चे साहित्यकार का कर्तव्य है।

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