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सबसे ऊपर लहराए मेरी हिन्दी

संजय सिंह ‘चन्दन’
धनबाद (झारखंड )
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मेरे देश का जज्बात है हिन्दी,
कहने को आजाद है हिन्दी
भारत में अब भी फसाद है हिन्दी,
दक्षिण में उल्टी-सी बात है हिन्दी।

उर्दू के कारण आघात है हिन्दी,
अँग्रेजी से होती वज्रघात है हिन्दी
दफ्तरों-बैंकों में झूठी बात है हिन्दी,
अँग्रेजी की दीमक ही खाई है हिन्दी।

घर-घर के नाम पट पर अपनी ही
आँसू बहाई है हिन्दी,
विज्ञान-अभियंत्रण पुस्तकों ने पंजों दबाई है हिन्दी
सरकारी फंडों से मस्ती उड़ाई है हिन्दी,
राष्ट्रभाषा, राजभाषा विभाग की मोटी
कमाई है हिन्दी।

‘हिन्दी पखवाड़ा’ दिखाया है हिन्दी,
रिश्तों में थोड़ी भरपाई है हिन्दी
भारत में अब भी पराई है हिन्दी,
अँग्रेजी के घर की जमाई है हिन्दी।

हमने ही मिलकर दबाई है हिन्दी,
कचहरी-थानों में उर्दू चीरहरण से
अब तक मुरझाई है हिन्दी,
अन्याय की तड़पन, न्याय की जरूरत
दिखाई है हिन्दी।

बस कविता और गानों में छाई है हिन्दी,
देवनागरी से चलकर ये आई है हिन्दी
फिर भी न अब तक ये भायी है हिन्दी,
आज़ादी की भाषा कहलाई है हिन्दी।

उपेक्षा की दृष्टि ही पाई है हिन्दी,
साहित्य की अगली लड़ाई है हिन्दी
राष्ट्रभाषा पर लेती अंगड़ाई है हिन्दी,
स्कूल में कड़ाई-पढ़ाई हो हिन्दी।

दफन हो अँग्रेजी, ताबूत बने जिन्दी,
वतन में लुटाओ बस हिन्दी ही हिन्दी
दिखे हर तरफ सबके लेखन में हिन्दी,
हिंदुस्तां ये हिंदी, राष्ट्रभाषा मेरी हिन्दी।

अपने घरों में कैद है सिमटती मेरी हिन्दी,
आज़ाद हो ये हिंदी, जिंदाबाद हो ये हिन्दी।
मिसाल हो ये हिंदी, बेमिसाल हो ये हिन्दी,
दुनिया में सबसे ऊपर लहराए मेरी हिन्दी॥

परिचय-सिंदरी (धनबाद, झारखंड) में १४ दिसम्बर १९६४ को जन्मे संजय सिंह का वर्तमान बसेरा सबलपुर (धनबाद) और स्थाई बक्सर (बिहार) में है। लेखन में ‘चन्दन’ नाम से पहचान रखने वाले संजय सिंह को भोजपुरी, संस्कृत, हिन्दी, खोरठा, बांग्ला, बनारसी सहित अंग्रेजी भाषा का भी ज्ञान है। इनकी शिक्षा-बीएससी, एमबीए (पावर प्रबंधन), डिप्लोमा (इलेक्ट्रिकल) व नेशनल अप्रेंटिसशिप (इंस्ट्रूमेंटेशन डिसिप्लिन) है। अवकाश प्राप्त (महाप्रबंधक) होकर आप सामाजिक कार्यकर्ता, रक्तदाता हैं तो साहित्यिक गतिविधि में भी सक्रियता से राष्ट्रीय संस्थापक-सामाजिक साहित्यिक जागरुकता मंच मुंबई (पंजी.), संस्थापक-संरक्षक-तानराज संगीत विद्यापीठ (नोएडा) एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.एन. क्लब (मुंबई) सहित अन्य संस्थाओं से बतौर पदाधिकारी जुड़ें हैं, साथ ही पत्रकारिता का वर्षों का अनुभव है। आपकी लेखन विधा-गीत, कविता, कहानी, लघु कथा व लेख है। बहुत-सी रचनाएँ पत्र-पत्रिका में प्रकाशित हैं, साथ ही रचनाएँ ४ साझा संग्रह में हैं। ‘स्वर संग्राम’ (५१ कविताएँ) पुस्तक भी प्रकाशित है। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में आपको
महात्मा बुद्ध सम्मान-२०२३, शब्द श्री सम्मान-२०२३, पर्यावरण रक्षक सम्मान-२०२३, श्रेष्ठ कवि सम्मान-२० २३ सहित अन्य सम्मान हैं तो विशेष उपलब्धि-राष्ट्रीय कवि सम्मेलन में कई बार उपस्थिति, देश के नामचीन स्मृति शेष कवियों (मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र आदि) के जन्म स्थान जाकर उनकी पांडुलिपि अंश प्राप्त करना है। श्री सिंह की लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी भाषा का उत्थान, राष्ट्रीय विचारों को जगाना, हिन्दी भाषा, राष्ट्र भाषा के साथ वास्तविक राजभाषा का दर्जा पाए, गरीबों की वेदना, संवेदना और अन्याय व भ्रष्टाचार पर प्रहार है। मुंशी प्रेमचंद, अटल बिहारी वाजपेयी, जयशंकर प्रसाद, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महादेवी वर्मा, रामधारी सिंह दिनकर, किशन चंदर और पं. दीनदयाल उपाध्याय को पसंदीदा हिन्दी लेखक मानने वाले संजय सिंह ‘चंदन’ के लिए प्रेरणापुंज-
पूज्य पिता जी, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, महात्मा गॉंधी, भगत सिंह, लोकनायक जय प्रकाश, बाला साहेब ठाकरे और डॉ. हेडगेवार हैं। आपकी विशेषज्ञता-साहित्य (काव्य), मंच संचालन और वक्ता की है। जीवन लक्ष्य-ईमानदारी, राष्ट्र भक्ति, अन्याय पर हर स्तर से प्रहार है। देश और हिंदी भाषा के प्रति विचार-“अपने ही देश में पराई है हिन्दी, अंग्रेजी से अंतिम लड़ाई है हिन्दी, अंग्रेजी ने तलवे दबाई है हिन्दी, मेरे ही दिल की अंगड़ाई है हिन्दी।”