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सावन सोमवार

राधा गोयल
नई दिल्ली
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“माँ,माँ…” १८ वर्षीया बेटी रिया दौड़ती हुई आई और बोली- “ये श्रावण मास के सोमवार का इतना महत्व क्यों है ? मैंने देखा कि भीड़ की भीड़ मन्दिर जा रही थी। लोग शिव जी पर जल और दूध चढ़ा रहे थे। बिल्व पत्र, बेल और धतूरा भी। मन्दिर के बाहर ही छोटी चारपाई पर रखकर कुछ लोग बिल्व पत्र, बेल और धतूरे के बीज बेच रहे थे।”
“बिटिया! माना जाता है कि श्रावण मास भगवान शिव और माता पार्वती के मिलन का महीना है, इसलिए ये उन दोनों को ही बेहद प्रिय है। श्रावण मास में शिव भक्त भगवान की विशेष पूजा करते हैं। नियमित रूप से मंदिर जाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। उन्हें बेलपत्र, धतूरा, चंदन और पुष्प आदि अर्पित करते हैं। शिव जी प्रसन्न होते हैं तो जो माँगो, वो दे देते हैं।”

“पर माँ! कुछ लोग तो शिव को अवधूत और भिखमंगा भी कहते हैं। वो कहते हैं कि जिसके अपने पास अपने पहनने के लिए कपड़े तक नहीं, वह किसी को क्या देगा ?”
“मेरी लाडो! भगवान शिव… जो तप-जप तथा पूजा आदि से प्रसन्न होकर भस्मासुर को ऐसा वरदान दे सकते हैं कि वह उन्हीं के लिए प्राणघातक बन गया, वह प्रसन्न होकर किसको क्या नहीं दे सकते हैं ? जो विश्वा ऋषि के माँगने पर पत्नी की बड़े अरमानों से बनवाई स्वर्ण नगरी लंका तक को दक्षिणा में दे सकते हैं, उनसे बड़ा दानी और अपरिग्रही कौन हो सकता है ? यह ठीक है कि असुर कहते हैं कि जो स्वयं भिखमंगा है, वह दूसरों को क्या दे सकता है ?, किन्तु संभवतः उन्हें यह नहीं मालूम कि किसी भी देहधारी का जीवन यदि है तो वह उन्हीं दयालु शिव की दया के कारण है; अन्यथा समुद्र से निकला हलाहल पता नहीं कब का शरीरधारियों को जलाकर भस्म कर देता, किन्तु दयानिधान शिव ने उस अति उग्र विष को अपने कण्ठ में धारण कर समस्त जीव समुदाय की रक्षा की। उग्र आतप वाले अत्यंत भयंकर विष को अपने कण्ठ में धारण करके समस्त जगत की रक्षा के लिए हिमाच्छादित हिमालय की पर्वत श्रृंखला में अपने निवास स्थान कैलाश को चले गए।
हलाहल विष…साक्षात मृत्यु स्वरूप… भगवान शिव यदि उसे पीकर समस्त जगत को जीवन प्रदान कर सकते हैं, यहाँ तक कि अपने जीवन तक को दाँव पर लगा सकते हैं तो उनके लिए और क्या अदेय रह जाता है ? सांसारिक प्राणियों को इस विष का जरा भी आतप न पहुँचे, इसको ध्यान में रखते हुए वे स्वयं बर्फीली चोटियों पर निवास करते हैं। विष की उग्रता को कम करने के लिए साथ में अन्य उपकारार्थ अपने सिर पर शीतल अमृतमयी जल किन्तु उग्रधारा वाली नदी गंगा को धारण कर रखा है।”
“माँ ये भस्मासुर, विश्वा ऋषि, हलाहल विष का पान…ये क्या है ?”
“लम्बी कहानियाँ हैं। अभी मुझे पूजा की तैयारी करनी है। बाद में आराम से बताऊँगी।”
“माँ! बस एक बात अभी बता दो । क्या श्रावण मास में सोमवार के दिन का खास स्थान है ?”
“हाँ बिटिया! वार अनुसार सोमवार सुधांशु अर्थात चन्द्रमा का ही दिन है। चन्द्रमा की पूजा भी स्वयं भगवान शिव को स्वतः ही प्राप्त हो जाती है, क्योंकि चन्द्रमा का निवास भी तो भगवान शिव के सिर पर ही है।”
“माँ! सावन के सोमवार का ऐसा क्या महत्व है ?
“तू भी ना रिया। इतना कुछ तो बताया। कहा जाता है कि सावन के सोमवार का व्रत रखने से मनवांछित कामना पूरी होती है। सुहागिन महिलाओं को सौभाग्यवती होने का आशीष प्राप्त होता है और पति को लंबी आयु प्राप्त होती है। वहीं अगर कुँवारी कन्याएँ ये व्रत रखें तो उन्हें सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है।”
“माँ! क्या आप भी ये व्रत करती थीं ?
“हाँ, करती थी, पर तूने ये क्यों पूछा ?”
” कुछ नहीं, बस ऐसे ही। तभी आपको इतने अच्छे… ।” रिया शरमा कर बोली।
“अब से मैं भी सावन के सोमवार के व्रत रखूँगी। बल्कि, सोलह सोमवार के व्रत रखूँगी।” कहते हुए रिया वहाँ से भाग गई।
“मैं तेरे दिल की बात समझ गई रिया”, माँ ने दिल ही दिल में कहा।

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