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सुगंध भी सुलभ न होगी

हेमराज ठाकुर
मंडी (हिमाचल प्रदेश)
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अगर न जागे आज दोस्तों,
कल को फिर से अंधेरा होगा
पराधीनी में था किसने धकेला ?
सवाल यह मेरा-तेरा होगा।

अपनी संस्कृति-सभ्यता की शायद,
फिर सुगंध भी सुलभ न होगी
कहीं आ न जाए फिर स्थिति वही,
जो सैंतालीस से पहले थी भोगी।

यह पछुआ बयार कहीं ले ही न डूबे,
फिर से भारत के गौरव को
आओ मिलकर पल्लवित-पुष्पित करते हैं,
अपनी संस्कृति-सभ्यता के सौरभ को।

उदासीनता भली नहीं है राष्ट्र धर्म में,
अपनी रीत तो अपनी ही होती है।
परिणाम कभी न अच्छा है होता,
जब देश की जनता सोती है॥

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