राजू महतो ‘राजूराज झारखण्डी’
धनबाद (झारखण्ड)
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प्राचीनता में पले-बढ़े,
आधुनिकता के रंगों में रंगे
हम वह बीच की कड़ी हैं,
दोनों को जिसने देखा-समझा,
हम वह अंतिम पीढ़ी हैं।
हमने डिबिया लालटेन देखा,
साइकिल का कमाल देखा
पाँच-दस पैसे का धमाल देखा,
आज फ्रिज का पानी पीने वाले
कल मटके का भी कमाल देखा।
गुरु को भगवान समझने वाले,
शिक्षा का होते व्यापार देखा
प्राचीन रीति-रिवाज मानने वाले,
आधुनिकता का भी हाल सीखा
हम वह अंतिम पीढ़ी हैं।
चिट्ठी का रहता था सदा इंतजार
आज मेल का पलभर में संचार
माँ की लोरी, दादी की कहानी,
अब बात हो गई बहुत पुरानी
नए दौर में मोबाइल की कहानी।
इतिहास और भविष्य का मेल,
संस्कृति को जिंदा रखने का खेल
दोनों की गवाही है जो पीढ़ी।
हम वह अंतिम पीढ़ी हैं,
जिसने दोनों को देखा-समझा॥
परिचय-साहित्यिक नाम `राजूराज झारखण्डी` से पहचाने जाने वाले राजू महतो का निवास झारखण्ड राज्य के जिला धनबाद स्थित गाँव-लोहापिटटी में है। जन्म तारीख १० मई १९७६ और जन्म स्थान धनबाद है। भाषा ज्ञान-हिन्दी का रखने वाले श्री महतो ने स्नातक सहित एलीमेंट्री एजुकेशन (डिप्लोमा) की शिक्षा प्राप्त की है। साहित्य अलंकार की उपाधि भी हासिल है। आपका कार्यक्षेत्र-नौकरी (विद्यालय में शिक्षक) है। सामाजिक गतिविधि में आप सामान्य जनकल्याण के कार्य करते हैं। लेखन विधा-कविता एवं लेख है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-सामाजिक बुराइयों को दूर करने के साथ-साथ देशभक्ति भावना को विकसित करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-प्रेमचन्द जी हैं। विशेषज्ञता-पढ़ाना एवं कविता लिखना है। देश और हिंदी भाषा के प्रति आपके विचार-“हिंदी हमारे देश का एक अभिन्न अंग है। यह राष्ट्रभाषा के साथ-साथ हमारे देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। इसका विकास हमारे देश की एकता और अखंडता के लिए अति आवश्यक है।