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हिंदी मेरी हिंदी…

डॉ. पुनीत कुमार द्विवेदी
इंदौर (मध्यप्रदेश)
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हिंदी और हमारी जिंदगी….

परिवार पहली है पाठशाला,
जहां माता निज भाषा बोलना ही
शिशु को सिखाती है,
पर आज की ये माँएं उर्फ मम्मी मम्माएँ,
सो जाने के लिए अंग्रेजी लोरियाँ सुनाती है।

हिन्दी का प्रचार और प्रसार अब मुश्किल,
हिन्दीसेवी हिंदी सेवा कर नहीं पाते हैं
इतना है अलबत्ता हिंदी सेवा बैनर तले,
अपनी सेवाएँ भली-भाँति करवाते हैं।

हिन्दी के जो पंडित हैं ज्ञाता सिद्ध वक्ता हैं,
हिंदी में विचार व्यक्त कर नहीं पाते हैं
‘हिन्दी लर्निंग इज वेरी इंपार्टेंट बिकॉज नैशनल लैंग्वेज’ है,
हमको बताते हैं।

हिंदी पुरस्कार वितरण में खूब मचे भ्रष्टाचार,
योग्य लेखकों के लेख काम नहीं आते हैं
जितने हैं चाटुकार ऊपरी पहुँच वाले,
हिंदी अकादमी से पुरस्कार पाते हैं।

हुए व्यावसायिक चित्रकार-गीतकार-कथाकार,
पैसे बिना काम कोई कर नहीं पाते हैं
पैसे के लिए ही मक़बूल जैसे चित्रकार,
वीणा वादिनी के नग्नचित्र भी बनाते हैं।

तो प्रार्थना है करता ‘पुनीत क्रांतिकारी’,
हिंदी टूट रही आज, इसकी अस्मिता बचाईए।
वीणा वादिनी की लाज को ना अब ख़तरा हो,
मक़बूलों का पकड़ टेंटूआ दबाइए।
कविता ख़तम हुई, तालियाँ बजाइए…॥