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हिंदी-शिक्षण की सुविधाओं से आवश्यक है उसकी आवश्यकता

डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’
मुम्बई(महाराष्ट्र)
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किसी भी भाषा के प्रचार-प्रसार का प्रमुख साधन है भाषा-शिक्षण। भाषा-शिक्षण के लिए विभिन्न प्रकार की सुविधाओं की आवश्यकता होती है, लेकिन सबसे अधिक आवश्यक है उसकी माँग। माँग तभी होगी जब किसी प्रयोजन के लिए उसकी आवश्यकता होगी। यदि भाषा के शिक्षण -प्रशिक्षण की सभी सुविधाएं उपलब्ध हों या उपलब्ध करवा दी जाएँ, तो भी तब तक बात नहीं बनेगी जब तक कि विद्यार्थी उस भाषा को सीखने के लिए उत्सुक न हों। कोई व्यक्ति कोई भाषा सामान्यत: तभी सीखता है जब उस भाषा का सीखना आवश्यक हो या उस भाषा को सीखने की आवश्यकता हो।
अगर कोई किसी को कहे कि सासाराम जाने के लिए गाड़ी की मुफ्त टिकट मिल रही है, वहां ठहरने की व्यवस्था भी हो जाएगी, खाने-पीने की सुविधाएं भी हैं, लेकिन कोई काम धंधे वाला आदमी, जिसके पास बिना मतलब कहीं जाने का कोई समय ही नहीं। सासाराम जाने का उसका कोई प्रयोजन नहीं, लाभ भी नहीं, वहाँ जाने में उसकी कोई रूचि का कारक भी नहीं, तो ऐसे में कितनी भी सुविधाएं उपलब्ध करवाई जाएँ कोई वहाँ क्यों जाएगा। कोई व्यक्ति कम सुविधाएँ होने पर भी या खर्च करके वहाँ जाना चाहेगा, जहाँ उसका कोई प्रयोजन सधता हो या उसकी रुचि का कुछ हो या फिर जहां जाना आवश्यक हो। यही बात भाषा के साथ भी है।
स्वतंत्रता के समय जब भारतीय भाषाओं में शिक्षण की बात की गई तो उस समय यह कहा गया कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में शिक्षण के लिए पर्याप्त पाठ्य सामग्री और पाठ्यपुस्तकें ही उपलब्ध नहीं हैं तो पढ़ाई कैसे होगी ? महात्मा गांधी मुस्काए और उन्होंने अर्थशास्त्र का मांग और पूर्ति का सिद्धांत समझाया। उन्होंने कहा कि जब शिक्षण का माध्यम बदलेगा तो निश्चित रूप से पाठ्य पुस्तकों की भारी मांग होगी। जब पुस्तकों की भारी मांग होगी तो प्रकाशक स्वयंमेव आगे आएँगे, भाषाओं के अनुवाद करने वाले भी मिल जाएँगे। माध्यम तो बदलिए। यदि हम माध्यम न बदलें और पाठ्य पुस्तकें उपलब्ध करवाने की कोशिश भी करें तो क्या लाभ होगा। गांधी जी का कथन अपने-आपमें स्पष्ट है कि, जब पुस्तकें खरीदने वाला ही कोई नहीं होगा तो कोई प्रकाशित प्रकाशित क्यों करेगा ? भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के हिंदी-प्रेमी वैज्ञानिक डॉ. विजय भार्गव ने उस विषय से संबंधित कई पुस्तकें हिंदी में तैयार की, लेकिन उनके मन में इस बात का दु:ख है कि उनका कोई पाठक नहीं है क्योंकि शिक्षण का माध्यम अंग्रेजी है।
विदेशों में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी शिक्षण का अधिकाधिक प्रसार हो। हिंदी-शिक्षण का प्रसार २ स्तरों पर आवश्यक है। पहला है भारत में हिंदी शिक्षण और हिंदी माध्यम से शिक्षण और दूसरा विदेशों में अथवा विदेशियों को हिंदी शिक्षण। विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार और प्रयोग को बढ़ाने के लिए अब हिंदी शिक्षण के पहले पक्ष पर विचार किए जाने की आवश्यकता है। प्रश्न उठ सकता है कि जब विदेशों में हिंदी बढ़ाने की बात है तो देश में हिंदी पढ़ाने या बढ़ाने की बात कहाँ से आ गई ? उत्तर भी उतना ही स्पष्ट है वृक्ष तो तभी बढ़ता है जब जड़ें मजबूत हों। पत्तों पर पानी डालने से तो कोई विशेष लाभ नहीं होता। जड़े सूखती जाएँ और पत्तों पर पानी डाला जाए तो आगे चलकर उसका हश्र क्या होगा, यह तो सभी जानते हैं। यदि आँकड़ों का विश्लेषण किया जाए तो यह समझ आ जाएगा कि विदेशों में जितने भी हिंदी जानने वाले या प्रयोग करने वाले हैं उनमें से अधिकांश की जड़ें तो भारत में ही हैं। विदेशों में हिंदी जानने वाले मुख्यतः २ वर्गों के लोग हैं। पहले जिन्हें हम गिरमिटियाओं के वंशज कहते हैं, यानी वे लोग जिन्हें अंग्रेज भारत से मजदूर बना कर ले गए थे, उनके वंशज। ये भारतवंशी लोग जो सदियों पूर्व भारत से गए, उनके वंशज आज भी धार्मिक-आध्यात्मिक कारणों या अपने पूर्वजों की मातृभूमि से लगाव के कारण हिंदी का दामन थामे हुए हैं। ऐसे देशों में निश्चित रूप से फिजी एक बहुत बड़ा नाम है। इनकी जड़ें भले ही थोड़ी पुरानी हो, लेकिन अंततः भारत भूमि में ही हैं।
दूसरा उन भारतीय प्रवासियों का बहुत बड़ा वर्ग है जो पिछले करीब १०० वर्ष के अंदर रोजी-रोटी, व्यापार-रोजगार आदि के कारण विदेशों में गया है। वहाँ भी हम यह पाते हैं कि उनकी वह पीढ़ी जो भारत में पली-बढ़ी, जिनकी मातृभाषा हिंदी रही या जो हिंदी में पढ़े-लिखे, वे विदेशों में जाकर भी हिंदी से जुड़े हुए हैं। विदेशों में बैठ कर भी हिंदी की अलख जगा रहे हैं। हालांकि, उनकी दूसरी तीसरी पीढ़ी तक आते-आते मातृभाषा की यह नमी सूखने लगती है।
अब भारत से विदेशों में जाने वाले लोग यदि यही अपनी मातृभाषा में नहीं पढ़े होंगे, यदि यहीं उनका मातृभाषा से कोई सरोकार नहीं होगा, यदि उन्हें यहीं अपनी भाषा से प्यार या सरोकार नहीं होगा तो वे विदेशों में जाकर किस हद तक हिंदी को अपनाएँगे, यह भली-भांति समझा जा सकता है। विश्व के विभिन्न देशों में जितने भी हिंदी-प्रेमी हैं, हिंदी के लेखक और साहित्यकार हैं, जिन्हें हम प्रवासी हिंदी साहित्यकार कहते हैं या प्रत्यक्ष परोक्ष रूप से हिंदी के समर्थक और हिंदी सेवी हैं, यह प्रायः भारत भूमि से ही जुड़े रहे हैं और इन्होंने बचपन से ही हिंदी को जीया है। ऑस्ट्रेलिया में अभियांत्रिकी प्रबंधन से जुड़े प्रो. सुभाष शर्मा कई देशों में रहे। वे जहाँ कहीं भी रहे, हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगे रहे। जब उन्हें कुरेदा गया कि आप तो अभियांत्रिकी और प्रबंधन के व्यक्ति हैं, हिंदी साहित्य से इतना प्रेम कैसे ? तो उन्होंने बताया कि स्कूल के समय उन्होंने उत्तर प्रदेश में हिंदी के आंदोलन में भाग लिया था। वहीं अपनी भाषा से प्रेम की जो कोपलें खिलीं, वही कोपलें एक वृक्ष का रूप धारण कर स्वप्रेरणा से विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार व प्रयोग का माध्यम बनी हुई हैं।
कहने का आशय यह है कि, जब भारत भूमि पर हिंदी की फसल उगेगी तो वह विदेशों में भी पहुंचेगी और वहाँ भी उगेगी, बढ़ेगी। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि विदेशों में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए भारत भूमि पर हिंदी शिक्षण और हिंदी भाषा माध्यम से शिक्षण की आवश्यकता है।
अगर हम हिंदी-शिक्षण की सुविधाओं की बात करें तो स्थिति उलट है। हिंदी के ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं के भी विद्यालय बड़ी संख्या में बंद होते जा रहे हैं और उससे कई गुना तेजी से अंग्रेजी माध्यम के बढ़ रहे हैं। यानी आवश्यकता न होने से उपलब्ध सुविधाएँ भी समाप्त होती जा रही हैं। विश्वविद्यालय स्नातकोत्तर स्तर पर कक्षाओं के लिए महाविद्यालयों में विद्यार्थी ना मिलने के कारण विभाग बंद होने की कगार पर हैं। देश में हजारों-लाखों भवन जिनमें कल तक हिंदी माध्यम के विद्यालय थे, अब उसमें अंग्रेजी के चलने लगे है। कारण स्पष्ट है कि अब वहाँ हिंदी माध्यम न आवश्यक है, न आवश्यकता।
ऐसे में यदि आप भारतीय भाषा माध्यम ज्ञान-विज्ञान की अच्छी से अच्छी पुस्तकें भी उपलब्ध करवा देंगे, हिंदी शिक्षण के लिए आधुनिकतम तकनीक और भाषा वैज्ञानिक ढंग से पढ़ाने की प्रविधि भी उपलब्ध करवा दें तो भी इससे कितना लाभ होगा, यह समझा जा सकता है। इसके विपरीत यदि पर्याप्त सुविधाएँ न भी हों तो भी माँग और पूर्ति के सिद्धांत के चलते रास्ते खुलने लगेंगे। कहा जाता है कि, आवश्यकता आविष्कार की जननी है। जब हिंदी शिक्षण के लिए आधुनिक परिवेश की आवश्यकता के अनुसार माँग पैदा होगी तो भाषा-वैज्ञानिक क्षेत्रीय आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर पाठ्य पुस्तकें भी तैयार कर देंगे। विभिन्न हिंदीतर भाषी राज्यों में जहाँ क्षेत्रीय भाषाओं के अनुकूल भाषा शिक्षण प्रविधि की आवश्यकता होगी, विकसित की या करवाई जा सकती है। भाषा-शिक्षण के लिए आधुनिकतम प्रौद्योगिकीयुक्त सुविधाएँ तथा शिक्षण-कक्ष उपलब्ध करवाए जा सकते हैं। भाषा प्रौद्योगिकीविद् भी समस्त सुविधाएँ उपलब्ध करवाने के लिए तैयार हो जाएँगे, लेकिन यदि हिंदी-शिक्षण की माँग ही नहीं होगी तो ये तमाम सुविधाएँ उपलब्ध होने पर भी कोई लाभ नहीं होगा। इसका परिणाम यह होगा कि जो कंपनियाँ और जो प्रकाशक व लेखक इस कार्य में लगे हैं, वे भी इस कार्य मुँह फेर लेंगे।
ऐसे कई बड़े भाषा प्रौद्योगिकीविदों को जानता हूँ, जिन्होंने अपनी भाषा से प्रेम और व्यवसायिक दृष्टि से हिंदी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में उच्च स्तरीय प्रौद्योगिकी विकसित की, उस पर काफी परिश्रम किया, काफी निवेश किया, उसके प्रचार-प्रसार में भी काफी खर्च किया, लेकिन जब उसकी माँग पैदा नहीं हुई, उनका परिश्रम भी बेकार गया और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा तो उन्होंने सब छोड़ दिया। जब हिंदी ही आवश्यक या आवश्यकता न होगी तो इस प्रौद्योगिकी को विकसित करने में जितना समय श्रम और खर्च आया है, क्या वह भी निकल सकेगा ? बात वहीं घूम फिर कर आ जाती है कि जो हम बना रहे हैं, क्या उसकी आवश्यकता अनुभव की जा रही है, क्या उसकी मांग है ? यदि जनता में उसकी माँग होगी तो सरकारी स्तर पर बहुत प्रयास करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। बढ़ती हुई माँग और उसमें लाभ को देखकर स्वयं ही प्रकाशक, उत्पादक और अनेक कंपनियां मैदान में उतर जाएँगी और अच्छी सुविधाएँ उपलब्ध करवाने लगेंगी। इसलिए हिंदी भाषा शिक्षण के लिए भी सर्वाधिक आवश्यक यह है कि या तो हिंदी शिक्षण आवश्यक हो या फिर उसकी आवश्यकता हो। अगर यह दोनों बातें नहीं होंगी तो हिंदी शिक्षण का कार्य अपेक्षा अनुसार आगे बढ़ना संभव नहीं होगा।
भारत में तो हिंदी सहित भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षण को लेकर पिछले लंबे समय से विपरीत धारा बह रही है। स्वतंत्रता के समय भारत में ९९ फीसदी से भी अधिक विद्यार्थी मातृभाषा में ही पढ़ते थे। स्वतंत्रता के पश्चात हिंदी को राष्ट्रीय स्तर पर पढ़ाया जाने लगा था। हिंदी भाषी क्षेत्रों में शिक्षा का माध्यम हिंदी भाषा ही था और अन्य राज्यों में भी कुछ अपवाद छोड़ दें तो दसवीं तक हिंदी पढ़ाई जाती रही है, लेकिन आगे चलकर विशेषकर १९८६ की शिक्षा नीति के पश्चात यह धारा विपरीत दिशा में बहने लगी और धीरे-धीरे मातृभाषा माध्यम के बजाय अंग्रेजी माध्यम के आने से हिंदी भाषी क्षेत्र के विद्यार्थियों का अपनी बात मातृभाषा यानी हिंदी माध्यम से नाता टूटने लगा। महानगरों से चलने वाली यह धारा धीरे-धीरे गाँवों तक पहुँच गई। उच्च शिक्षाओं से बहने वाली धारा धीरे-धीरे नर्सरी स्तर तक पहुँचती चली गई। फिर आगे चलकर एक नया खुमार चढ़ा। पहले विदेशी भाषाएं विश्वविद्यालय स्तर पर अलग पाठ्यक्रम के तौर पर पढ़ाई जाती थी, ताकि जिन्हें उस क्षेत्र में कार्य करना होगा वे सीखेंगे, लेकिन आगे चलकर यूरोपियन भाषाओं को शाला स्तर पर पढ़ाया जाने लगा जिससे हिंदी की जगह विदेशी भाषाएँ लेने लगीं, जो ज्यादातर विद्यार्थियों के जीवन में कभी काम नहीं आती। रोजगार आदि के विभिन्न क्षेत्रों में अंग्रेजी की अनिवार्यता इस हद तक बढ़ी कि हर कोई उसमें बहने लगा। यही कारण रहा कि संविधान के अनुसार हमें जाना था संघ की राजभाषा हिंदी की ओर और हम जाने लगे औपनिवेशिक भाषा अंग्रेजी की ओर।
हम कितनी भी अपनी भाषा की बात करें, राजभाषा की बात करें, हिंदी की बात करें राष्ट्रीय संपर्क भाषा की बात करें, राष्ट्रीय एकता या राष्ट्र-प्रेम की दुहाई दें, लेकिन भाषा तो वही अपनानी पड़ती है जो पेट की भाषा होती है, रोजगार की भाषा होती है। अगर संसाधनों का ढलान अंग्रेजी की तरफ रहेगा तो शिक्षा का ढलान हिंदी या भारतीय भाषाओं की तरफ कैसे होगा ? इसलिए यह आवश्यक है कि रोजगार के विभिन्न क्षेत्रों में हिंदी भाषा के प्रयोग को प्रतिष्ठित किया जाए। जब रोजगार के क्षेत्रों में हिंदी की आवश्यकता बढ़ेगी तो उसका सीधा प्रभाव हिंदी-शिक्षण पर पड़ेगा और जब शिक्षा के क्षेत्र में हिंदी का प्रचार होगा तो वह न केवल देश में बल्कि विदेशों तक पहुंचेगा।
जहां तक विदेशों में हिंदी प्रसार का प्रश्न है। अगर एक नजर में देखें तो पिछले कुछ दशकों में विदेशों में हिंदी का प्रचार-प्रसार काफी हुआ है। इसका मुख्य कारण यह है कि भारत से बहुत बड़ी संख्या में रोजगार के लिए भारत के लोग विदेशों में गए हैं। इनमें बहुत बड़ी संख्या हिंदी भाषी क्षेत्र से गए हुए प्रवासी भारतीयों की भी हैं। अपनी भाषा, संस्कृति से प्रेम और अपने धर्म से जुड़े रहने की आकांक्षा को लेकर ये प्रवासी भारतीय विदेशों में भी हिंदी से जुड़े हुए हैं। कहना न होगा कि गिरमिटिया मजदूरों के वंशज लंबे समय तक विदेशों में रहने के बावजूद भी रामचरितमानस से जुड़े रहने के चलते हिंदी से जुड़े रहे हैं, लेकिन समय के साथ-साथ उसके प्रभाव में भी कमी देखी जा रही है। यह सही है कि विश्व के विभिन्न विवि में आज भी हिंदी पढ़ाई जाती है लेकिन अगर इसका सही आकलन किया जाए तो इसमें भी कुछ कमी दर्ज की गई है। इसके पीछे का मुख्य कारण यह है कि आवश्यक और आवश्यकता की कमी। इसलिए यह आवश्यक है कि देश और विदेश दोनों ही स्तर पर हिंदी को आवश्यक अथवा आवश्यकता से जोड़ें।
विदेशों में हिंदी के प्रसार का एक बहुत बड़ा माध्यम हमारी धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत है। आज भी बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय अपनी सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत से जुड़े रहने के लिए सामाजिक स्तर पर और अपने बच्चों को मंदिरों आदि के माध्यम से भी हिंदी सिखाने के प्रयास में लगे हैं। अपनी भाषा से जुड़े रहने के लिए कवि सम्मेलनों आदि का भी आयोजन किया जाता है। इसी प्रकार जब विदेशों में भारतीय अध्यात्म दर्शन और प्राचीन कला-संस्कृति का यदि सही ढंग से प्रचार किया जाए तो न केवल देश में पर्यटन का विकास होगा, बल्कि इस माध्यम से भी लोग भारत के बारे में जानने-समझने के लिए हिंदी सीखना चाहेंगे।
जहाँ तक भारत में विदेशियों के लिए हिंदी शिक्षण की सुविधाओं की बात है, केंद्रीय हिंदी संस्थान (आगरा) सहित विभिन्न विश्वविद्यालयों आदि में हिंदी शिक्षण की सुविधाएँ हैं। हिंदुस्तानी प्रचार सभा (मुंबई) सहित कई स्वयंसेवी संस्थाएँ भी इस कार्य में लगी हैं, लेकिन आज के युग में कोई व्यक्ति अपना देश छोड़ कर लंबे समय के लिए भारत में आकर भाषा सीखे, इसमें अनेक कठिनाइयाँ हैं। इसलिए यह उपयुक्त होगा कि केंद्रीय हिंदी संस्थान तथा महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय आदि के माध्यम से विदेशों में ई-शिक्षण द्वारा डिप्लोमा पाठ्यक्रम आदि संचालित किए जाएँ। इसी प्रकार अंशकालिक व अल्पकालिक पाठ्यक्रम प्रारंभ किए जाएँ। यहाँ यह भी उपयोगी होगा कि भारत सरकार द्वारा हिंदी शिक्षा संघ जैसी संस्थाओं को हिंदी शिक्षण से संबंधित पाठ्य सामग्री, शिक्षण संबंधी सॉफ्टवेयर व अन्य सुविधाएँ उपलब्ध करवा कर उनके माध्यम से विदेशों में हिंदी के प्रयोग को बढ़ाने का प्रयास करें। निश्चय ही इससे विश्व में हिंदी के प्रचार-प्रसार में मदद मिलेगी, लेकिन इसके बावजूद हिंदी शिक्षण के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा हिंदी शिक्षण की आवश्यकता।
कहा जाता है कि किसी व्यक्ति को तभी सम्मान मिलता है, जब वह स्वयं को सम्मान दे। यही बात भाषा के भी साथ है। यदि हमारे वरिष्ठ अधिकारी और नेता ही अपनी भाषाओं को न अपनाएँ तो भले ही कितनी भी सुविधाएँ और भाषण हों, इसका नकारात्मक संदेश तो निरंतर विश्व में पहुंचता है। जापान के हिंदी व विभिन्न भारतीय भाषाओं के विद्वान तोमियो मीजोकामी कहते हैं-‘पहले जब भारत के शीर्ष नेता हमारे देश में आ कर अंग्रेजी में बोलते थे तो हमारे देश में भारत की कोई बहुत अच्छी छवि नहीं थी, लेकिन जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहाँ आ कर हिंदी में बोलते हैं तो हमारी निगाह में भारत की छवि एक स्वाभिमानी देश के रूप में उभरी है, और हमारे देश के लोग में भी अब हिंदी के प्रति रुचि बढ़ी है।’

निश्चय ही सरकार द्वारा जिस प्रकार हिंदी शिक्षा, हिंदी माध्यम से शिक्षा और हिंदी के माध्यम से रोजगार की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं, इससे निश्चय ही हिंदी की आवश्यकता में वृद्धि होगी। इसके चलते देश-दुनिया में भी हिंदी का और अधिक प्रयोग व प्रसार भी होगा। इससे भारत में विकास निचले स्तर तक पहुंचेगा तथा भारत की वैश्विक छवि में भी वृद्धि होगी।

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