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हिम्मत रखकर उत्साह व साहस से किए कार्य की सफलता निश्चित

गोवर्धन दास बिन्नाणी ‘राजा बाबू’
बीकानेर(राजस्थान)
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साहस-उत्साह-हिम्मत…

बिना डरे अर्थात परिणाम की परवाह किए बिना जब किसी का भी सामना करते हैं, तब वह कार्य ‘साहस’ कहलाता है। उसी प्रकार जब किसी भी कृत्य को पूरा करने पर उतारू हो जाते हैं, तब उसे हम उत्साह मानते हैं। इसी कड़ी में जब किसी भी कठिन कार्य को सही तरीके से पूरा कर लेते हैं, अर्थात जब कोई खतरनाक या साहसी काम करेंगे, तो उसे हम हिम्मत मानते हैं।
सर्वविदित और स्पष्ट है कि साहस और हिम्मत पर्यायवाची हैं, लेकिन इनके समय और विषय के अनुसार अलग-अलग अर्थ होते हैं। उपरोक्त को बढ़िया ढंग से समझाने के लिए पौराणिक काल की एक रोचक कथा के अनुसार-गरुड़, सुदर्शन चक्र तथा सत्यभामा को अभिमान हो गया था और उनके अभिमान को दूर करने के लिए श्री हनुमानजी ने अपने साहस.. उत्साह…हिम्मत द्वारा प्रभु श्रीकृष्ण की भावना अनुसार वह कार्य सम्पन्न कर दिया।
प्रभु श्रीकृष्ण ने पत्नी सत्यभामा को स्वर्ग से पारिजात लाकर दिया था, इसीलिए वह अपने-आपको प्रभु श्रीकृष्ण की अत्यंत प्रिय और अति सुंदरी मानने लगी थी। ऐसे ही चक्र को यह अभिमान हो गया था कि उसने इंद्र के वज्र को निष्क्रिय किया था। प्रभु श्रीकृष्ण अतंतः उसकी ही सहायता लेते हैं तो गरुड़ प्रभु श्रीकृष्ण का वाहन था, वह समझता था कि प्रभु मेरे बिना कहीं जा ही नहीं सकते।
श्रीकृष्ण जानते थे कि हनुमानजी न केवल साहसी व हिम्मती हैं, बल्कि हर कार्य को पूरे उत्साह से पूर्ण करते हैं, इसलिए उनको याद किया। हनुमानजी यह जानते थे कि श्रीकृष्ण और प्रभु श्रीराम दोनों एक ही हैं, अतः वे बिना विलम्ब किए सीधे राजदरबार न जाकर कुछ कौतुक करने के लिए उद्यान में चले गए। वृक्षों पर लगे फल तोड़ने लगे, कुछ खाए, कुछ फेंक दिए, वृक्षों को उखाड़ फेंका, कुछ तो तोड़ डाला…बाग वीरान बना दिया। फल तोड़ना और फेंक देना तो उनका मकसद था ही नहीं, बल्कि वे तो श्रीकृष्ण के संकेत से कौतुक कर रहे थे…। बात श्रीकृष्ण तक पहुंची। श्रीकृष्ण ने गरुड़ को बुलाया और कहा, “जाओ, सेना ले जाओ। उस वानर को पकड़कर लाओ।”
गरुड़ ने कहा, “प्रभु, एक मामूली वानर को पकड़ने के लिए सेना की क्या जरूरत है ? मैं अकेला ही उसे मजा चखा दूंगा।”
श्रीकृष्ण मन ही मन मुस्करा दिए… “जैसा तुम चाहो, लेकिन उसे रोको।”
वे गए, और हनुमानजी को ललकारा, “बाग क्यों उजाड़ रहे हो ? फल क्यों तोड़ रहे हो ? चलो, तुम्हें प्रभु श्रीकृष्ण बुला रहे हैं।”
हनुमान जी ने कहा, “मैं किसी प्रभु श्रीकृष्ण को नहीं जानता। मैं तो प्रभु श्रीराम का सेवक हूँ। जाओ, कह दो, मैं नहीं आऊंगा।”
गरुड़ क्रोधित होकर बोला, “तुम नहीं चलोगे, तो मैं तुम्हें पकड़कर ले जाऊंगा।”
हनुमानजी ने कोई उत्तर नहीं दिया… गरुड़ की अनदेखी कर वह फल तोड़ते रहे, साथ ही साथ गरुड़ को समझाया भी। गरुड़ नहीं माना… तब हनुमानजी ने अपनी पूंछ बढ़ा गरुड़ को दबोच लिया। उसका घमंड दूर करने के लिए कभी पूंछ को ढीला कर देते, गरुड़ कुछ साँस लेता, और जब कसते तो गरुड़ के मानो प्राण ही निकल रहे हो… हनुमानजी ने सोचा…भगवान का वाहन है, प्रहार भी नहीं कर सकता, लेकिन इसे सबक तो सिखाना ही होगा। इसलिए पूंछ को झटका दिया और गरुड़ को दूर समुद्र में फेंक दिया। बड़ी मुश्किल से वहाँ से गरुड़ दरबार में पहुंचा… प्रभु को बताया, वह कोई साधारण वानर नहीं है… मैं उसे पकड़कर नहीं ला सकता।
प्रभु मुस्करा दिए-सोचा गरुड़ का घमंड तो दूर हो गया…लेकिन अभी इसके वेग के घमंड को भी चूर करना है।
श्रीकृष्ण ने कहा, “गरुड़, श्री हनुमानजी प्रभु श्रीराम जी के भक्त हैं, इसीलिए नहीं आया। यदि तुम कहते कि प्रभु श्रीराम ने बुलाया है, तो फौरन भागे चले आते। तुम तेज उड़ सकते हो…तुम्हारी गति बहुत है, उसे साथ ही ले आना।”
गरुड़ वेग से उड़े, मलय पर्वत पर पहुँच सर्वप्रथम हनुमानजी से क्षमा मांग फिर जैसा समझाया, वैसा संदेशा दिया…।
हनुमानजी मन ही मन मुस्कराए…प्रभु की लीला समझ गए।
कहा, “तुम जाओ, मैं तुम्हारे पीछे ही आ रहा हूँ।”
द्वारिका में श्रीकृष्ण प्रभु श्रीराम का रूप धारण कर सत्यभामा को माता सीता बना, सिंहासन पर बैठ गए…सुदर्शन चक्र को आदेश दिया…द्वार पर रहना… कोई बिना आज्ञा अंदर न आने पाए…।
भगवान श्रीकृष्ण को तो ज्ञात था कि, श्रीराम का संदेश सुनकर तो हनुमानजी एक पल भी रुक नहीं सकते…अभी आते ही होंगे। गरुड़ को तो हनुमानजी ने विदा कर दिया और स्वयं उससे भी तीव्र गति से उड़कर पहले ही द्वारका पहुंच गए। दरबार के द्वार पर सुदर्शन ने उन्हें रोक कर कहा, “बिना आज्ञा अंदर जाने की मनाही है।”
जब प्रभु श्रीराम बुला रहे हों तो हनुमानजी विलंब सहन नहीं कर सकते…सुदर्शन को पकड़ा और मुँह में दबा अंदर पहुँच गए। वहां सिंहासन पर प्रभु श्रीराम और माता सीता जी बैठे थे…हनुमानजी समझ गए…। प्रभु श्रीराम को प्रणाम किया और कहा, “प्रभु, आने में देर तो नहीं हुई ?” साथ ही कहा, “प्रभु माँ कहाँ है ? आपके पास आज यह कौन दासी बैठी है ?
सत्यभामा ने सुना तो लज्जित हुई, क्योंकि वह समझती थी कि श्रीकृष्ण द्वारा पारिजात लाकर दिए जाने से वह सबसे सुंदर स्त्री बन गई है…सत्यभामा का घमंड चूर हो गया।
उसी समय गरुड़ तेज गति से उड़ने के कारण हांफते हुए दरबार में पहुंचा…। साँस फूल रही थी, थके हुए से लग रहे थे…हनुमानजी को दरबार में देखकर तो वह चकित हो गए। मेरी गति से भी तेज गति से हनुमानजी दरबार में पहुंच गए ? लज्जा से पानी-पानी हो गए।गरुड़ के बल का और तेज गति से उड़ने का घमंड चूर हो गया…।
श्रीराम ने पूछा, “हनुमान! तुम अंदर कैसे आ गए ? किसी ने रोका नहीं ?”
“रोका था प्रभु, सुदर्शन ने…मैंने सोचा आपके दर्शनों में विलंब होगा…इसलिए उनसे उलझा नहीं, उसे मैंने अपने मुँह में दबा लिया था।” यह कहकर मुँह से सुदर्शन को निकालकर प्रभु के चरणों में डाल दिया।
तीनों के घमंड चूर हो गए। श्रीकृष्ण यही चाहते थे। श्रीकृष्ण ने हनुमानजी को गले लगाया, हृदय से हृदय की बात हुई… और उन्हें विदा कर दिया।

उपरोक्त दृष्टांत में साहस, उत्साह व हिम्मत तीनों का समावेश है। समय एवं विषय अनुसार इनके अर्थ भी स्पष्ट परिलक्षित हैं। हम कह सकते हैं कि यदि कोई हिम्मत रख उत्साह व साहस से कार्य करे तो सफलता सुनिश्चित होती है, जिसके फलस्वरूप यश व धन दोनों ही प्राप्त हो सकते हैं।

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