कुल पृष्ठ दर्शन : 4

अविरत बढ़ना सत्य पथ

डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)

*************************************************

बीती आज विभावरी, हुआ सबेरा  आज।
पौरुष दुनिया जागता, इष्ट सुपथ आगाज॥

अविरत बढ़ना सत्य पथ, हो आलस तम नाश।
उद्योगी अरुणिम किरण, विजय ज्योति बन आश॥

दिखे मार्ग पौरुष विविध, नव विहान आगाज़।
कठिन कार्य निर्णय सुपथ, मति विवेक कर साज॥

रिद्धि सिद्धि पथ पार्थ श्रम, कुसुमित सदा निकुंंज।
सुरभित पौरुष कीर्ति फल, परहित कोकिल गुंज॥

सहज सरल पौरुष प्रकृति, रहे आत्मविश्वास।
विघ्नेश्वर अरुणिम किरण, भर दे शक्ति प्रयास॥

अटल ध्येय संकल्प हो, रहे आस्था कर्म।
संयम साहस धैर्य बल, मति विवेक सद्धर्म।

मातृभूमि भारत प्रणय, हो अभीष्ट  अवदान।
परसेवा उन्नति वतन, मिले विजय  यश मान॥

कर्म-धर्म के मर्म को, एकनिष्ठ   हो बोध।
धीर-वीर बढ़ते सुपथ, मिटे विघ्न  अवरोध॥

संघर्षों विचलित करे, टूटे मन विश्वास।
यहीं धैर्य मनमीत बन, खोले पथ  बिंदास॥

अनुभव हो पथ वेदना, संवेदन      आभास।
बढ़े आत्मबल लक्ष्य पथ, चहुँ मुख सदा विकास॥

संस्कार व्यवहार से, नीति रीति  सत्कार्य।
शील त्याग गुण विनय पथ, जीवन में अनिवार्य॥

ईश्वरीय आराधना, सफल साधना  लोक।
ईश कृपा पौरुष खिले, विजय कीर्ति आलोक॥

परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥ 
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥