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एक मुलाक़ात

सरोजिनी चौधरी
जबलपुर (मध्यप्रदेश)
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जीवन में कब, कहाँ, किससे फिर से मुलाक़ात हो जाए, पता नहीं। मैं गर्मी की छुट्टियों के बाद अपने परिवार के साथ लखनऊ से जबलपुर जा रही थी। लखनऊ और कानपुर के बीच एक स्टेशन आता है- उन्नाव, जहाँ पर रेलगाड़ी थोड़ी देर रुकती है। अधिकतर उन्नाव में काम करने वाले लौटते समय उसी ट्रेन से कानपुर जाते हैं, क्योंकि ट्रेन का समय उनकी छुट्टी के हिसाब से ठीक था। अधिकतर लोग रिजर्वेशन वाली बोगी में ही बैठते, क्योंकि तब सोने का समय नहीं होता था।
जब हमारी गाड़ी उन्नाव स्टेशन पर पहुँची, तो ७-८ महिलाएँ एकसाथ बोगी के अंदर आ गईं और बैठने की जगह बनाने लगीं। थोड़ी देर में सबने अपने बैठने का स्थान बना लिया। मेरे साथ मेरे दोनों बच्चे और पति भी थे, सबने थोड़ा संकुचित होते हुए उन लोगों को बैठने के लिए जगह दे दी। थोड़ी देर में मेरी निगाह सामने वाली सीट पर बैठी महिला पर पड़ी, जो लगातार मुझे देखती जा रही थी। मुझे भी उसका चेहरा कुछ-कुछ पहचाना-सा लगा और एकाएक मुँह से निकला कुसुम!! और वह भी उतनी ही शीघ्रता से बोल उठी सरोजिनी!!
हम दोनों साथ एम.ए.करके यूनिवर्सिटी से निकले थे, मेरी शादी हो गई और वह बी.एड. करने लगी।फिर हम दोनों का मिलना नहीं हुआ। पहले मोबाइल, फ़ेसबुक, आदि नहीं था। हमलोग लगभग पन्द्रह वर्ष बाद मिले थे, फिर तो कब कानपुर स्टेशन आया; पता ही नहीं चला। उसके साथ वाली महिलाएँ कहने लगीं, चलो कानपुर आ गया। जल्दी-जल्दी हम दोनों ने एक-दूसरे का पता लिखा और फिर वह गाड़ी से उतर गई।