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एहसास-ए-बरसात

नीलम प्रभा सिन्हा
धनबाद (झारखंड)
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पहली बूँद गिरी बरसात में मेरे हाथ पर,
मेरे दिल में ख़याल आया हँसता चेहरा तेरा
लगा जैसे तुमने दिल से मुझे पुकारा,
मैंने भी धीरे से कहा, आओ प्यारे, बरसात में।

तेरे ही एहसास भरे हैं मिट्टी की ख़ुशबू में,
मेरा भीगा हुआ मन भी तेरे पास है
पानी की बूँदें बरस रही हैं आँगन में,
और ऐसी आवाज़ आती है, जैसे कोई बुला रहा है
कमरे में मैं हूँ, पर यादों में तेरी जाग रही हूँ।

चाय भी पीती हूँ तेरी ही यादों में जैसे,
बारिश के पानी में तेरा चेहरा
बनता-बिगड़ता रहता है
इस दिल को तेरे पास ही जाना है,
जाए कैसे, यह समझ नहीं आता है।

बरसात तो हर वर्ष आती है,
पर ऐसा एहसास कभी नहीं हुआ
इस बार पता नहीं क्यों…?
मन तुझे देखने को तरस रहा है,
हर बूँद के साथ तेरी याद आती ही रहे
और यह दिल तेरे इंतज़ार में धड़कता रहे।

इस दर्द के साथ तेरी याद आती ही रहे,
इस बरसात में कोई बहुत याद कर रहा है
ऐसा लग रहा है मुझे शायद दूर रहकर भी कोई मेरे दिल के पास है,
और उसकी याद इस बरसात में मेरे साथ है।

न, ये केवल बरसात नहीं,
ये मोहब्बत का एहसास है।
मौसम भी भीगा है, मन भी भीगा है इश्क़ में
आज शाम आ जाओ, इंतज़ार में हूँ तेरे।
दिल की बेचैनी को शांत कर दो,
इस बरसात में मेरे॥