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समकालीन समाज की विसंगतियों पर तीखा प्रहार ‘काले धन के बोनसाई’

मुकेश इन्दौरी
इन्दौर (मध्यप्रदेश) 
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पुस्तक समीक्षा…

नंदकिशोर बर्वे न केवल एक सशक्त व्यंग्यकार हैं, बल्कि कलाकार व नाटककार भी हैं। उनके कई नाटक चर्चित हुए हैं। श्री बर्वे अपने चुटकीले संवादों, कटाक्ष व अभिनय से पाठकों-दर्शकों पर अलग छाप छोड़ते हैं।
नंदकिशोर बर्वे का ये दूसरा व्यंग्य संग्रह ‘काले धन के बोनसाई’ (न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन) है। श्री बर्वे बातों-बातों में उलझी हुई गाँठों को खोलकर रख देते हैं। उनके व्यंग्य, बिगड़ैल व्यवस्थाओं की बखिया उधेड़ देते हैं।

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वर्तमान युग, जिस पर आधुनिक युग का आवरण चढ़ा हुआ है; वो वास्तव में मूलतः हमारे सांस्कृतिक एवं मानवीय मूल्यों के पराभाव का युग है। मुखौटों के इस दौर में जहाँ यथार्थ के चेहरों पर इतने आवरण चढ़े हुए हैं, कि वास्तविकता को पहचानना मुश्किल है; ऐसे में प्याज के छिलके की तरह चढ़े हुए इन आवरणों को हटाने का काम कोई कर सकता है, तो वो निसंदेह केवल एक व्यंग्यकार ही कर सकता है।
इस संग्रह में कुल ४८ व्यंग्य रचनाएं हैं। उन्होंने इन रचनाओं में विसंगतियों को उभारने के लिए जिन मिथकों का सहारा लिया है, वो बेजोड़ हैं।
ये संग्रह समकालीन समाज और राजनीति की विद्रुपताओं पर एक तीखा प्रहार है। लेखक ने दर्शाया है, कि कैसे भ्रष्टाचार अब एक विशाल वृक्ष नहीं, बल्कि घर-घर में सजाया जाने वाला ‘बोनसाई’ बन गया है। लेखक ने रचनाओं में खासकर सरकारी आँगनों में व्याप्त भ्रष्टाचार, चुनावी वादों के खोखलेपन और मध्यम वर्ग की दोहरी मानसिकता को बड़ी सूक्ष्मता से उकेरा है। संग्रह की विशेषता है, कि प्रचलित लोकोक्तियों को मसलन ‘चिंतक नियरे ही राखिये’, ‘सूत भी कपास भी’, ‘हज, बिल्ली और चूहे’, ‘कथा अनंता’ व ‘कुत्ते और कुत्तापन’ आदि को शीर्षक बनाकर उन पर भी व्यंग्य रचना की गई है, जो काफी रोचक है। संग्रह में आधुनिक साहित्यकारों पर भी खूब व्यंग्य है। साहित्यकार जी की संस्था, सम्मान का मान, पुरस्कार चयन समिति, आत्मकथा का माहात्म्य, साहित्यकार जी के घर में खट-पट व्यंग्य है, जो इन तथाकथित आधुनिक साहित्यकारों को आइना दिखाते हुए प्रतीत होते हैं।
रचनाओं में कुछ पंच बहुत उम्दा हैं, जैसे- पति तो बेचारे हमेशा अल्पमत में सरकार का मुखिया जैसा, यह जो सड़क है अन्दर से नरम और ऊपर से कड़क है, सड़क नहीं, ये लक्ष्मण झूला है, मुद्दों को ठण्डे बस्ते में डालने का विशेषाधिकार केवल सरकार के पास ही होता है, नो डिसीजन इस बेस्ट डिसीजन, ये बड़े पहलवान हैं एकदम खानदानी, मंच पर रमने के लिए आपका तन-मन लालायित रहता है। ऐसे ही एक से बढ़कर एक पंच इन रचनाओं में हैं, जो व्यंग्य को धारदार एवं रोचक बनाते हैं।
लेखक की भाषा सहज, सरल और आम बोलचाल की है, लेकिन उनकी मारक क्षमता गहरी है, जो एक अच्छे व्यंग्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। रचनाओं में मुहावरों का प्रयोग और कटाक्ष की शैली पाठक को हँसने-गुदगुदाने पर मजबूर करती है, पर यह हँसी अंततः एक गंभीर सोच में बदल जाती है।
यह संग्रह केवल मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि समाज के कुरूप चेहरे को दिखाने वाला आइना है।नंदकिशोर बर्वे ने व्यंग्य को केवल विनोद तक सीमित न रखकर उसे एक सामाजिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया है, जो विसंगतिकारों के कलेजे को छलनी करने में सक्षम है। संग्रह के लिए हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।