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पहली बारिश तर कर गई…

डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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ये प्रश्न पूछना
क्या सार्थक था ?
हर दिन में कई बार
कि तुम कहाँ हो ?

नज़र दौड़ाई,
तो तुम्हें हर
वॉट्सएप ग्रुप में पाया,
तुम्हारे संदेश जैसे मुझे चिढ़ा रहे हैं।

तुम्हें पूछा तो
हमेशा की तरह,
लंबा मौन ही पाया
या फिर कई प्रश्न रहे निरुत्तर!

फिर आँखें बंद कर के,
अपने आस-पास ढूँढा
अपनी हर एक साँस में,
तुम्हें संजीदगी से महसूस किया।

जब आँख खुली,
तो तुम सामने खड़े थे
उन रिमझिम बूँदों की तरह,
जो तन को हौले-हौले भिगा दे।

सारे गिले-शिकवे मिटाकर,
आज उस प्रीत आलिंगन में
भरकर मुझे तृप्त कर गए,
यूँ लगा कि जैसे
पहली बारिश मेरे अंतर्मन को तर कर गई॥