डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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मानव सभ्यता के विकास में ‘शास्त्र’ का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। शास्त्र केवल ग्रंथ नहीं, अपितु जीवन को दिशा देने वाले ज्ञान, अनुशासन, नीति, विज्ञान और आध्यात्मिक चेतना के आधार स्तंभ हैं। भारतीय संस्कृति में शास्त्रों को ज्ञान का दिव्य स्रोत माना गया है। ‘शास्’ धातु से निर्मित ‘शास्त्र’ शब्द का अर्थ है — जो शिक्षित करे, अनुशासित करे और जीवन को सत्य मार्ग की ओर प्रेरित करे। वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, गीता, पुराण, धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र तथा आयुर्वेद आदि भारतीय शास्त्रों की अमूल्य धरोहर हैं।
भारतीय शास्त्र केवल धार्मिक उपदेश नहीं देते, बल्कि मानव जीवन के प्रत्येक पक्ष का वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक विवेचन प्रस्तुत करते हैं। आचार, विचार, नीति, चिकित्सा, ज्योतिष, योग, संगीत, वास्तु, युद्धकला तथा सामाजिक व्यवस्था जैसे अनेक विषयों का गहन ज्ञान शास्त्रों में निहित है। यही कारण है कि भारतीय ज्ञान परंपरा विश्वभर में सम्मान की दृष्टि से देखी जाती है।
समकालीन युग में विज्ञान और तकनीक के तीव्र विकास के बावजूद शास्त्रों की प्रासंगिकता बनी हुई है। आज जब मानव मानसिक तनाव, नैतिक पतन, पारिवारिक विघटन और पर्यावरणीय संकट जैसी समस्याओं से जूझ रहा है, तब शास्त्र जीवन में संतुलन, संयम और मानवीय मूल्यों की शिक्षा देते हैं। भगवद्गीता का कर्मयोग, उपनिषदों का आत्मज्ञान, योगशास्त्र का स्वास्थ्य विज्ञान तथा आयुर्वेद की जीवनशैली आज पूरे विश्व में स्वीकार की जा रही है। आधुनिक शोध भी यह प्रमाणित कर रहे हैं कि भारतीय शास्त्रों में निहित अनेक सिद्धांत वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी हैं।
शास्त्रों की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है, कि उन्होंने मानव को केवल भौतिक उन्नति नहीं, बल्कि आत्मिक उत्कर्ष का मार्ग भी दिखाया। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ तथा ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ जैसे सार्वभौमिक संदेश देकर विश्व बंधुत्व और मानव कल्याण की भावना को विकसित किया।
भारतीय शास्त्रों ने शिक्षा, साहित्य, संगीत, दर्शन और संस्कृति को समृद्ध बनाया तथा समाज को नैतिक आधार प्रदान किया। आज आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी शास्त्रों के वास्तविक स्वरूप को समझे और उन्हें अंधविश्वास नहीं, बल्कि ज्ञान-विज्ञान तथा जीवन-दर्शन के रूप में ग्रहण करे। शास्त्र हमें विवेक, संयम, कर्तव्य- निष्ठा और मानवता का पाठ पढ़ाते हैं। वे अतीत की धरोहर ही नहीं, वर्तमान के मार्गदर्शक और भविष्य के प्रेरणास्रोत भी हैं।
अतः, शास्त्र भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। वे ज्ञान का ऐसा प्रकाशपुंज हैं, जो मानव जीवन को सत्य, सदाचार और श्रेष्ठता की ओर अग्रसर करते हैं।
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥