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सुकून के लिए..

हरिहर सिंह चौहान
इन्दौर (मध्यप्रदेश )
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कहीं बूँदों की रिमझिम,
कहीं ‘बरसात’ का पानी 
ऐसे में सोचता है ‘पागल’ मन,
ठहर जाए यहीं ‘जमीं पर सुकून के लिए।

यही सुखद अहसास है बरसात का,
मन भी तृप्त, ‘आत्मा’ भी प्रसन्न, सुख का आगमन
धरती की ‘तपन’ में जब पानी की बूँदें गिरतीं है,
तो ‘मिट्टी’ की सौंधी महक जमीं पर सुकुन लिए होती है।

तभी तो किसान ऊपर आसमान में निहारता है,
टकटकी लगाए ‘पानी’ चाहता है अपनी जमीं के लिए
वह बूँदें उसके खेतों के लिए उन्नति लाएगी,
तभी वह अपने ‘परिवार’ के साथ जमीं पर सुकून से नाचता-गाता है।

यह बारिश का ‘पानी’ हर किसी के लिए जीवन है,
जरूरत है, हमारी प्यास बुझाने के लिए पानी चाहिए।
ज़िन्दगी में हम इसकी ‘क़ीमत” पहचाने, इसे बचाएं,
क्योंकि ‘पानी’ है तो कल है, और हमारे लिए तो सुकून का पल है॥