डॉ. शैलेश शुक्ला
लखनऊ (उत्तरप्रदेश)
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सोमश पर्वथनेनी ने अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, तब तक सुधार के बाद बनने वाली परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के पास यह अधिकार होना चाहिए। उनके मुताबिक़ बिना ‘वीटो’ वाले स्थायी सदस्यों की नई श्रेणी बनाना उन्हें व्यवहार में दूसरे दर्जे का सदस्य बना देगा। भारत का यह रुख़ नया नहीं है, पर सवाल यह है कि वह इस पर इतना अड़ा क्यों है और इससे उसे आख़िर मिलेगा क्या ?
पहले यह समझ लें कि ‘वीटो’ असल में क्या है। सुरक्षा परिषद में पाँच स्थायी सदस्य हैं:अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुसार प्रक्रिया से जुड़े मामलों को छोड़कर बाकी फ़ैसलों के लिए ९ सदस्यों की हाँ चाहिए और उनमें पाँचों स्थायी सदस्यों की सहमति भी शामिल होनी चाहिए। इसका मतलब है, कि इनमें से कोई १ भी इनकार कर दे तो प्रस्ताव गिर जाता है, भले ही बाकी चौदह देश उसके पक्ष में हों। यानी परिषद में असली ताक़त वोटों की गिनती से नहीं, इसी अधिकार से तय होती है।
पर्वथनेनी ने इतिहास का हवाला भी दिया। १९६५ में परिषद का विस्तार हुआ तो अस्थायी सदस्य छह से बढ़कर दस हो गए, पर स्थायी सदस्य पाँच ही रहे। इससे स्थायी और चुने हुए सदस्यों का अनुपात ५:६ से बदलकर ५:१० हो गया और भारत के मुताबिक़ पाँचों की ताक़त और मज़बूत हो गई। इसी कारण भारत कहता है कि अगर सुधार सिर्फ़ अस्थायी सीटें बढ़ाने तक सीमित रहा तो उसे विफलता ही माना जाएगा। वह यह भी चाहता है, कि बातचीत लिखित प्रस्तावों पर हो और उसके लिए साफ़ समय-सीमा तय की जाए।
अब सवाल है कि ‘वीटो’ वाली स्थायी सीट से भारत को क्या लाभ होगा। पहला लाभ है-लगातार मौजूदगी। भारत ८ बार परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है, आख़िरी बार २०२१-२२ में। अब वह २०२८-२९ के लिए प्रयास कर रहा है। इसका चुनाव जून २०२७ में होना है और एशिया-प्रशांत समूह की एकमात्र सीट के लिए उसका मुक़ाबला ताजिकिस्तान से है। स्थायी सीट का मतलब है कि भारत हर बहस और हर प्रस्ताव की चर्चा में शुरू से शामिल रहेगा, फ़ैसले बन चुकने के बाद नहीं।
दूसरा लाभ है- सुरक्षा कवच। चार्टर के अनुसार सदस्य देश परिषद के फ़ैसले मानने के लिए बाध्य हैं। ऐसे में ‘वीटो’ वाला देश अपने हितों के ख़िलाफ़ किसी प्रस्ताव को पारित होने से रोक सकता है। बिना ‘वीटो’ की स्थायी सीट में यह सुरक्षा नहीं मिलती, क्योंकि अंतिम फ़ैसला तब भी वही पाँच देश करते रहेंगे जिनके पास यह अधिकार है। भारत इसे केवल रुतबे का नहीं, सिद्धांत और बराबरी का सवाल बताता है।
तीसरा लाभ- आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई से जुड़ा है। संयुक्त राष्ट्र की १२६७ प्रतिबंध समिति तय करती है कि किस व्यक्ति या संगठन को आतंकी सूची में डाला जाए। भारत लंबे समय से कहता रहा है कि इस सूची में नाम जोड़ने और हटाने में पारदर्शिता की कमी है और वह इसे एक तरह का छिपा हुआ ‘वीटो’ बता चुका है। इसी साल अगस्त में परिषद की बहस में भारत ने कहा कि सदस्यता का इस्तेमाल आतंकियों को वैधता दिलाने के लिए नहीं होना चाहिए। मसूद अज़हर का मामला इसकी मिसाल है। भारत ने २००९ में उसे सूची में डलवाने की कोशिश शुरू की थी, पर चीन ने बार-बार इसे रोका। आख़िरकार २०१९ में अमेरिका की पहल के बाद चीन की आपत्ति हटी और वह सूची में आ सका। स्थायी सदस्य के रूप में भारत ऐसे मामलों में अपनी बात कहीं ज़्यादा मज़बूती से रख सकेगा, हालाँकि किसी दूसरे स्थायी सदस्य का ‘वीटो’ इससे अपने-आप ख़त्म नहीं हो जाएगा।
चौथा लाभ- कूटनीतिक वज़न है। संयुक्त राष्ट्र और भारत सरकार के अनुसार भारत के लगभग २.७५ से २.९ लाख कर्मी अब तक शांति-अभियानों में सेवा दे चुके हैं और क़रीब १८० की जान गई है। संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों में भारत २०२३ से दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक़ २०२७ में वह जापान को पीछे छोड़कर चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इतना योगदान और वज़न रखने वाले देश के पास जब फ़ैसले की मेज़ पर स्थायी जगह होगी, तो विकासशील देशों की चिंताएँ भी ज़्यादा असरदार ढंग से उठ सकेंगी। इस माँग को समर्थन भी मिल रहा है। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और रूस भारत की स्थायी सदस्यता का समर्थन कर चुके हैं, हालाँकि अमेरिका का समर्थन सुधरी हुई परिषद के लिए है, जबकि रिपोर्टों के अनुसार चीन अकेला स्थायी सदस्य है जिसने खुला समर्थन नहीं दिया। सितंबर २०२६ में हंगरी, पोलैंड, स्लोवाकिया और चेक गणराज्य ने भी भारत का साथ दिया।
अफ़्रीकी संघ की एज़ुलविनी सहमति भी २ स्थायी सीट ‘वीटो’ समेत माँगती है और जी-४ ने अफ़्रीका की इस साझा स्थिति का समर्थन किया है। यानी ‘वीटो’ की माँग अकेले भारत की नहीं, विकासशील दुनिया के एक बड़े हिस्से की है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखना चाहिए। ‘वीटो’ केवल रोक सकता है, किसी प्रस्ताव को पारित नहीं करवा सकता। उसकी एक क़ीमत भी होती है, क्योंकि २०२२ के बाद ‘वीटो’ होने पर महासभा में उस पर बहस होती है। भारत खुद भी ‘वीटो’ के दुरुपयोग की शिकायत करता रहा है, इसलिए उसे इसका इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना होगा। यह भी याद रखना चाहिए कि स्थायी सदस्य बनने पर कठिन मुद्दों पर साफ़ पक्ष लेना होगा, जिससे कुछ मित्र देश नाराज़ भी हो सकते हैं। इसमें सबसे बड़ी बाधा चार्टर ख़ुद है।
फिर भी भारत की माँग को ज़िद कहना ठीक नहीं होगा। सुधार की बहस अब अकेले भारत की नहीं रही, १९३ देश इस पर बातचीत कर रहे हैं। जो देश शांति के लिए जान देता रहा हो, जिसकी आबादी और अर्थव्यवस्था दुनिया के भविष्य को आकार दे रही हो, उसके लिए बराबरी की माँग स्वाभाविक है। ‘वीटो’ सहित स्थायी सीट भारत को सुरक्षा, आवाज़ और भरोसा, तीनों दे सकती है। बशर्ते वह धैर्य रखे, समर्थन जुटाए और मिली ताक़त को ज़िम्मेदारी से बरते।