कुल पृष्ठ दर्शन :

मेरा भाई

बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
*****************************************

‘विश्व भाई दिवस’ विशेष….

एक समय के बाद,
धीरे-धीरे बदलने लगते हैं भाई भी
वे उतना नहीं बोलते,
जितना बचपन में बोलते थे।

उनकी हँसी,
घर के आँगन से निकलकर
ज़िम्मेदारियों की भीड़ में खो जाती है,
जो लड़का कभी
बारिश में भीगते हुए,
कागज़ की नाव बहाया करता था
वही एक दिन
राशन की थैली उठाए,
थके कदमों से घर लौटता है।

बहनें अक्सर देखती हैं,
कि भाई अचानक बड़े नहीं होते
वे धीरे-धीरे,
अपने हिस्से की इच्छाएँ छोड़ते जाते हैं।

पिता की चुप्पियों के बाद,
घर में जो दूसरा मौन जन्म लेता है
वह अक्सर भाई के भीतर होता है,
मैंने देखा है
कुछ लड़के,
अपनी उम्र से पहले बूढ़े हो जाते हैं
सिर्फ इसलिए
कि घर की दीवारें टिकी रहें।

उनके सपनों की जेब में,
बहुत कम जगह बचती है
क्योंकि वहाँ,
माँ की दवाइयाँ
बिजली के बिल,
बहन की पढ़ाई
और भविष्य की चिंताएँ रखी होती हैं।

एक समय के बाद,
भाई अपने दुःख बताना छोड़ देते हैं
वे कहते हैं
“सब ठीक है”,
और इसी छोटे-से वाक्य के भीतर
छिपा लेते हैं
अपनी असफलताएँ,
अपनी थकान
अपना अकेलापन।

घर के सबसे मज़बूत दिखाई देने वाले लोग,
अक्सर सबसे अधिक टूटे हुए होते हैं भीतर से।

मुझे याद है,
मेरा भाई
जब छोटा था,
तो अँधेरे से डरता था
और अब वही,
पूरे घर के डर अपने भीतर लेकर जीता है।

वह कभी-कभी,
रात को बहुत देर तक जागता है
जैसे किसी अदृश्य हिसाब में,
अपने जीवन को जोड़-घटा रहा हो।

उसके हाथों की रेखाएँ,
अब पहले जैसी नहीं रहीं
उनमें संघर्ष की कठोरता उतर आई है,
लेकिन अजीब बात यह है
कि इतने बदल जाने के बाद भी,
भाई पूरी तरह बदलते नहीं।

वे अब भी,
राखी बँधवाते समय
थोड़ा भावुक हो जाते हैं,
अब भी
माँ की आवाज़ सुनकर,
बचपन की तरफ लौट जाते हैं
अब भी
बहनों की विदाई में,
चुपचाप दूसरी तरफ मुँह फेर लेते हैं।

मैंने जाना है,
भाई केवल एक रिश्ता नहीं होता
वह घर की उस दीवार की तरह होता है,
जो हर मौसम सहती है
ताकि भीतर रहने वाले सुरक्षित रह सकें,
समय
धीरे-धीरे सब बदल देता है
चेहरे,
रास्ते
घर,
संबंधों की भाषा भी।

पर कुछ चीज़ें,
आख़िर तक नहीं बदलतीं,
जैसे-
मुसीबत में सबसे पहले याद आना
एक भाई का नाम।

और यह विश्वास,
कि दुनिया चाहे जितनी अजनबी हो जाए।
एक व्यक्ति कहीं न कहीं,
अब भी तुम्हारे लिए
चुपचाप खड़ा है॥