बबिता कुमावत
सीकर (राजस्थान)
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मर्म रचयिता (मुंशी प्रेमचंद विशेष)…
वे केवल लेखक नहीं थे,
वे उस भारत की आवाज़ थे
जो खेतों की मेड़ों पर उगता था,
और भूख के साथ भी
ईमान का अन्न बोता था।
उन्होंने महलों की नहीं,
झोपड़ियों की कथा लिखी
उनकी कलम ने,
धूल से ढके चेहरों में
मनुष्यता का उजाला खोजा।
‘गोदान’ में होरी की थकी साँसें,
‘कफ़न’ में संवेदना का कठोर प्रश्न
‘ईदगाह’ में हामिद का छोटा-सा चिमटा,
आज भी समय से पूछते हैं-
क्या विकास केवल शहरों का होता है ?
प्रेमचंद ने,
शब्दों को आभूषण नहीं बनाया
उन्होंने उन्हें,
अन्याय के विरुद्ध खड़ा कर दिया।
उनकी भाषा,
जन-जन की साँसों से बनी
और उनकी कथाएँ,
समाज का आईना बन गईं।
उन्होंने बताया,
साहित्य का धर्म
सिर्फ़ मनोरंजन नहीं,
मनुष्य के भीतर
करुणा को जीवित रखना भी है।
उनकी दृष्टि में,
किसान केवल पात्र नहीं था
वह राष्ट्र की धड़कन था,
स्त्री केवल संबंध नहीं थी
वह संघर्ष, स्वाभिमान और अस्मिता की पहचान थी।
आज जब,
शब्द बाज़ार में बिकने लगे हैं
तब प्रेमचंद की कलम,
अब भी हमें याद दिलाती है
लेखन का सबसे बड़ा पुरस्कार,
मनुष्य के पक्ष में खड़ा होना है।
वे समय से आगे चलने वाले रचनाकार थे,
उनकी रचनाएँ
इतिहास की धरोहर ही नहीं,
वर्तमान की चेतावनी भी हैं।
प्रेमचंद,
आपकी कलम ने
साहित्य को समाज का दर्पण नहीं,
समाज का अंतःकरण बना दिया॥