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नारी अब अबला नहीं

संतोष भावरकर ‘नीर’ 
गाडरवारा(मध्यप्रदेश)
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नारी मर्यादा की मूरत है,
करुणामई जिसकी सूरत है
बहिन का अनमोल प्यार है,
पत्नी के रूप में संसार है।
नारी को न समझो,
तुम अब कोमल
जो हर समस्या का,
पल में करती है हल।
हर क्षेत्र में है वो आगे,
दुश्मन भी उससे डर के भागे
कभी दुर्गा कभी काली बन जाती है,
कभी मदर टैरेसा बन
दुनिया को जगाती है।
कभी झांसी की रानी बनती,
कभी इंदिरा बन देश चलाती है
कभी विंग कमांडर बन,
फाइटर प्लेन उड़ाती है।
वही नारी माँ अपने बच्चों को,
लोरी गा के सुलाती है
घर के हर दायित्व निभाती,
जो अपने घर को स्वर्ग बनाती है।
नारी ईश्वर का अनमोल उपहार है,
नारी का लोहा मानता संसार है
वह हर रूप में पूजी जाती है,
तभी तो वह नारी कहलाती है।
नारी अब अबला नहीं,
एक चिंगारी है
नारी के आगे झुकती,
दुनिया सारी है॥

परिचय-संतोष भावरकर का साहित्यिक उपनाम-नीर है। इनकी जन्मतिथि २३ मार्च १९७५ तथा जन्म स्थान-जिला छिंदवाड़ा है। आप वर्तमान में सालीचौका रोड,गाडरवारा (म.प्र.)में निवासरत एवं यही स्थाई पता है। एम.ए.(संस्कृत साहित्य,हिंदी साहित्य),बी.एड और पीजीडीसीए की शिक्षा प्राप्त श्री भावरकर का कार्यक्षेत्र-अध्यापक का है। लेखन विधा-गीत,ग़ज़ल,कविता,कहानी और लेख है।राष्ट्र स्तरीय पत्र-पत्रिकाओं में १९९२ से सतत लगभग ४०० कविता,आलेख,ग़ज़ल,गीत,कहानी और मुक्तक का प्रकाशन हो चुका है। साथ ही कई ई-पत्रिकाओं में भी कविता प्रकाशित हुई है। ऎसे ही आपके खाते में प्रकाशित सांझा काव्य संग्रह में-काव्य-कलश,दिव्यतूलिका ,जीवन-सुधा आदि हैं। यदि सम्मान की श्रंखला देखें तो आपको दिल्ली से रचना शतकवीर सम्मान,काव्य-कलश सम्मान ,ग्वालियर से दिव्यतूलिका सम्मान सहित हरियाणा से बाबू बालमुकुंद गुप्त हिंदी साहित्य सेवा सम्मान आदि प्राप्त हैं। अनेक साहित्यिक-सामाजिक-शासकीय संस्थाओं द्वारा भी आपको सम्मान-पत्र एवं प्रशस्ति-पत्र से सम्मानित किया गया है। नीर की दृष्टि में लेखनी का उद्देश्य-हिंदी भाषा को समृद्ध बनाना एवं समाज में जागृति लाना है।