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कहना तो पड़ेगा

डॉ. मोतीलाल गुप्ता ‘आदित्य’
मुम्बई(महाराष्ट्र)
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भारतीय भाषाओं में अंतर्संवाद समय की मांग…

साहित्य जनमानस के धरातल पर जनभाषा में उपजता और पुष्पित-पल्लवित होता है। सरकार सभी स्तरों पर औपनिवेशिक दासता और उसके सभी प्रतीकों से छुटकारा पाने की बात कर रही है, लेकिन फिर भी भारतीय भाषाओं के साहित्य के पुरोधा और भारत की साहित्य अकादमी अंग्रेजी के बोझ तले, हीन ग्रंथी लिए दबी हुई-सी दिखती है। ऐसे साहित्यिक आयोजकों की भी कमी नहीं, जो भारत में और हिंदी अथवा भारतीय-भाषाओं के आयोजन को ‘लिटफेस्ट’ नाम देकर अंग्रेजी का मुकुट पहन कर इतराते हैं, जाने वाले भारतीय भाषाओं के साहित्यकार भी आवाज नहीं उठाते हैं। उन्हें लगता है कि ‘साहित्योत्सव’ कहने से उनका कद कम हो जाएगा। जो अपनी भाषा-भाषाओं पर इतना शर्मिंदा हो, वह साहित्य का कितना भला करेगा, कैसा साहित्य रचेगा। देश में साहित्य से जुड़े हर व्यक्ति को, हर साहित्यकार को यह प्रश्न उठाने का अधिकार है और पूछना भी चाहिए कि साहित्य अकादमी अंग्रेजी के औपनिवेशिक लबादे को कब तक अपने और साहित्यकारों पर लादे रहेगी। सवाल तो साहित्यकारों और साहित्य-समीक्षकों पर भी उठता है कि वे किस भय से इस पर चुप्पी साधे रहते हैं। समय आ गया है कि अकादमी पर चढ़े अंग्रेजी के मुलम्मे को उतार कर फैंका जाए। भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों और साहित्यिक आयोजकों को भी अंग्रेजी के आतंक से मुक्त होना होगा।