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हिन्द की बेटी हूँ

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
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बंदिशों के पिंजरों को छोड़ के चली हूँ मैं,
छूना है गगन को, हवाओं से लड़ी हूँ मैं
धरती पर रह रही थी कब से
आज गगन को छू रही हूँ मैं।

पहचान है मेरी जो उस पर,
आज पहुंच रही हूँ मैं
माँ भारती की बेटी हूँ, जो चाहूं पाके रहती हूँ
हाँ, मैं बेटी हूँ, हाँ मैं बेटी हूँ।

अत्याचार का संघर्षों से,
देती हूँ जवाब मैं
नौ महीने गर्भ में संतान को हूँ पालती,
देश के लिए जान हाथ में ले के चली हूँ मैं।

विश्व के उजालों में हूँ, हिन्द की मशाल मैं
हिन्द की मैं बेटी हूँ, मैं लाज उसकी रखती हूँ
हाँ मैं माँ भारती की बेटी हूँ, हाँ मैं बेटी हूँ।

किरण हो या विलियम्स, सिन्धु हो या चानू,
जीवन में ले के प्रेरणा है इनके जैसा बनना
नकाब पहनूं या घूँघट, है कम कहाँ मेरा हुनर!
हिन्द की मैं बेटी हूँ, मैं मान उसका रखती हूँ।

हाँ मैं माँ भारती की बेटी हूँ, हौसला रखती हूँ,
रोटी भी बनाती हूँ, चलाती हूँ बंदूक भी
उड़ाती हूँ राफेल भी, देश भी चलाती हूँ,
देख कर जो दंग रह जाए वर्ल्ड का खेल ऐसे खेलती हूँ।

कसम खा चुकी हूँ मैं, ना पीछे मुड़ के है देखना
हिन्द की बेटी हूँ, स्वतंत्र हो के रहती हूँ।
मैं बेटी हूँ, हाँ मैं बेटी हूँ,
सब कर सकती हूँ, मैं हिंद की बेटी हूँ॥