डॉ. योगेन्द्र नाथ शुक्ल
इन्दौर (मध्यप्रदेश)
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वह नगर की सबसे बड़ी पत्र- पत्रिकाओं की दुकान थी। पूरी दुकान पत्र-पत्रिकाओं और उपन्यासों से सजी हुई थी। अंदर, मालिक का केबिन बना था और उसके बाहर एक सोफा रखा था। केबिन के बाहर मालिक का निज सचिव बैठा था। साधारण-सी वेशभूषा में एक सज्जन आए।
उन्होंने अपना नाम एक स्लिप में लिखकर निज सचिव द्वारा अंदर पहुंचाया। संकेत पाकर वह अंदर जाने के लिए जैसे ही उठे, वैसे ही एक सूटेड-बूटेड सज्जन वहाँ आए। निज सचिव ने जैसे ही उन्हें देखा, पहले वाले सज्जन को बैठ जाने का इशारा कर बाद में आए सज्जन को झुक कर उसने नमस्कार किया और अंदर केबिन का दरवाजा खोलकर उन्हें आदर के साथ अंदर बुलाया।
यह पूरा दृश्य देखकर अलमारी में सामने की ओर रखी एक अर्धनग्न तस्वीर वाली पत्रिका, धूल खाती स्तरीय पत्रिका से बोली “तुम्हारी ही तरह तुम्हारा प्रकाशक हो गया है… सुनो, जो बिकाऊ होता है उसकी पूछ परख अधिक होती है।”
उसकी बात सुनकर दूसरी तिलमिलाकर बोली- “सुनो बहना…! २०-२५ बरस पहले तुम भी मेरे जैसी स्थिति में धूल खाया करती थीं और तुम्हारा प्रकाशक भी सबके हाथ जोड़ता फिरता था…।”
सब समय का फेर है।