डॉ.राम कुमार झा ‘निकुंज’
बेंगलुरु (कर्नाटक)
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मनुष्य का मन विचारों का अथाह सागर है, जिसमें प्रतिक्षण असंख्य तरंगें उठती-गिरती रहती हैं। ये विचार ही हमारे व्यक्तित्व, व्यवहार और जीवन-दृष्टि का निर्माण करते हैं, परंतु केवल विचारों का होना पर्याप्त नहीं है; उनकी सार्थक अभिव्यक्ति ही उन्हें मूल्यवान बनाती है। जब मन के भाव उचित शब्दों, कर्मों या सृजन के माध्यम से व्यक्त होते हैं, तभी वे समाज और स्वयं के लिए उपयोगी सिद्ध होते हैं।
विचारों की सार्थक अभिव्यक्ति का अर्थ है—सत्य, संवेदना और विवेक के साथ अपनी अनुभूतियों को प्रकट करना। यह केवल बोलना या लिखना नहीं, बल्कि अपने भीतर के यथार्थ को ईमानदारी से सामने लाना है। कई बार व्यक्ति के मन में श्रेष्ठ भाव होते हैं, परंतु अभिव्यक्ति के अभाव में वे दबे रह जाते हैं और धीरे-धीरे कुंठा का रूप ले लेते हैं। इसके विपरीत जब वही विचार संतुलित और स्पष्ट रूप में प्रकट होते हैं, तो वे न केवल आत्म-संतोष देते हैं, बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते हैं।
सार्थक अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण पक्ष जिम्मेदारी है। आज के समय में जब संचार के अनेक माध्यम उपलब्ध हैं, विचारों को व्यक्त करना आसान हो गया है, परंतु उनकी गुणवत्ता और प्रभाव पर ध्यान देना और भी आवश्यक हो गया है। सोचे-समझे बिना कही गई बातें भ्रम, विवाद एवं नकारात्मकता को जन्म दे सकती हैं। इसलिए अभिव्यक्ति में संयम, संवेदनशीलता और तथ्यात्मकता का होना अनिवार्य है।
विचारों की अभिव्यक्ति केवल शब्दों तक सीमित नहीं होती। यह कला, संगीत, साहित्य, चित्रकला और व्यवहार के माध्यम से भी प्रकट होती है। एक चित्रकार अपने रंगों से, एक कवि अपनी पंक्तियों से और एक साधारण व्यक्ति अपने आचरण से अपने मन की गहराइयों को व्यक्त करता है। इस प्रकार अभिव्यक्ति का प्रत्येक रूप समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।
यथार्थ यह है, कि सार्थक अभिव्यक्ति व्यक्ति को भीतर से सशक्त बनाती है। यह आत्मविश्वास को बढ़ाती है और व्यक्ति को अपनी पहचान बनाने में सहायक होती है। साथ ही, यह समाज में संवाद और समझ को भी सुदृढ़ करती है। जब लोग अपने विचार स्पष्ट और ईमानदारी से व्यक्त करते हैं, तो आपसी संबंधों में पारदर्शिता और विश्वास बढ़ता है।
अंततः, कहा जा सकता है कि मन के विचारों की सार्थक अभिव्यक्ति एक कला भी है और एक साधना भी। यह हमें अपने भीतर झांकने, सत्य को स्वीकार करने और उसे सकारात्मक रूप में प्रस्तुत करने की प्रेरणा देती है। जब विचारों को सही दिशा मिलती है, तो वे न केवल व्यक्ति के जीवन को समृद्ध करते हैं, बल्कि समाज को भी एक नई दिशा प्रदान करते हैं।
परिचय-डॉ.राम कुमार झा का साहित्यिक उपनाम ‘निकुंज’ है। १४ जुलाई १९६६ को दरभंगा में जन्मे डॉ. झा का वर्तमान निवास बेंगलुरु (कर्नाटक)में,जबकि स्थाई पता-दिल्ली स्थित एन.सी.आर.(गाज़ियाबाद)है। हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी,मैथिली,बंगला, नेपाली,असमिया,भोजपुरी एवं डोगरी आदि भाषाओं का ज्ञान रखने वाले श्री झा का संबंध शहर लोनी(गाजि़याबाद उत्तर प्रदेश)से है। शिक्षा एम.ए.(हिन्दी, संस्कृत,इतिहास),बी.एड.,एल.एल.बी., पीएच-डी. और जे.आर.एफ. है। आपका कार्यक्षेत्र-वरिष्ठ अध्यापक (मल्लेश्वरम्,बेंगलूरु) का है। सामाजिक गतिविधि के अंतर्गत आप हिंंदी भाषा के प्रसार-प्रचार में ५० से अधिक राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक सामाजिक सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़कर सक्रिय हैं। लेखन विधा-मुक्तक,छन्दबद्ध काव्य,कथा,गीत,लेख ,ग़ज़ल और समालोचना है। प्रकाशन में डॉ.झा के खाते में काव्य संग्रह,दोहा मुक्तावली,कराहती संवेदनाएँ(शीघ्र ही)प्रस्तावित हैं,तो संस्कृत में महाभारते अंतर्राष्ट्रीय-सम्बन्धः कूटनीतिश्च(समालोचनात्मक ग्रन्थ) एवं सूक्ति-नवनीतम् भी आने वाली है। विभिन्न अखबारों में भी आपकी रचनाएँ प्रकाशित हैं। विशेष उपलब्धि-साहित्यिक संस्था का व्यवस्थापक सदस्य,मानद कवि से अलंकृत और एक संस्था का पूर्व महासचिव होना है। इनकी लेखनी का उद्देश्य-हिन्दी साहित्य का विशेषकर अहिन्दी भाषा भाषियों में लेखन माध्यम से प्रचार-प्रसार सह सेवा करना है। पसंदीदा हिन्दी लेखक-महाप्राण सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ है। प्रेरणा पुंज- वैयाकरण झा(सह कवि स्व.पं. शिवशंकर झा)और डॉ.भगवतीचरण मिश्र है। आपकी विशेषज्ञता दोहा लेखन,मुक्तक काव्य और समालोचन सह रंगकर्मी की है। देश और हिन्दी भाषा के प्रति आपके विचार(दोहा)-
स्वभाषा सम्मान बढ़े,देश-भक्ति अभिमान।
जिसने दी है जिंदगी,बढ़ा शान दूँ जान॥
ऋण चुका मैं धन्य बनूँ,जो दी भाषा ज्ञान।
हिन्दी मेरी रूह है,जो भारत पहचान॥