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पंछी की पुकार

ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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प्यासे पंछी की पुकार, दाना-पानी की बौछार,
दाना चुग पानी पी कर, पंछी उड़ते पंख पसार।

छत गलियारा खेत खलिहान, उड़ जाते पंछी नादान,
जहां भी दिखता पानी दाना, उड़ कर आते ये विहंग।

सुबह होते कलरव करते खग, जिससे जागे सारा जग,
चहचहाहट प्यारी लगती, अंधियारा दूर भागे अब सब।

एक गौरैया प्यासी आई, कहीं तो मिल जाता बस पानी,
चोंच खुली और आँखें थकी, आस लगाई तो बस पानी।

व्याकुल नैना-थकती चाल, कहीं तो हो पानी की आवाज,
दाना-पानी, दाना-पानी, मिट तो जाए पानी का आगाज।

दूर कहीं पर गलियारे में, एक कटोरी में था कुछ पानी,
देख उसे अब थकान मिटे, आज पीकर ठंडा-ठंडा पानी।

कौआ करता काँव-काँव, उल्लू रात में करता हूँ-हूँ,
तोता करता टेंटें-टेंटें, कबूतर की होती गुटर-गुं-गुटर-गुं।

मोर जंगल में जब नाचे, देख उसे सबका दिल नाचे,
कोयल की कूक प्यारी लगती, सुन सभी हर्षित हो जाते।

बाज की नजरें होती तेज, झपटा मारे शिकार को देख
कबूतर बनता है डाकिया, जरा पीछे मुड़ कर तू ये देख।

कौवा गिद्ध और बाज न होते, तो गंदगी साफ कैसे होती ?
सभी पंछियों की अलग ही बातें, काम करते सभी निराले।

तोता-मैना की कहानी, जाने सारी ये दुनिया दीवानी।
प्यार वाले पक्षी प्यार सिखाती, नफरत न कर मेरे राही॥