पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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रात के ११ बज गए थे। गायत्री किचन में बर्तन धो रही थी, महिम अपने बिस्तर पर लेटा हुआ करवटें बदल रहा था।
वह मन ही मन में सोच रहा था, कि मेरी पत्नी को कितनी मेहनत करनी पड़ती है। सुबह के ५ बजे की उठी हुई अभी भी लगी हुई है। बेचारी बर्तन, झाड़ू-पोंछा करने के बाद खाना बना कर उसका टिफिन लगाने के बाद ही अपनी नौकरी पर जाती है।
ज़िंदगी कितनी कठिन है, चाहे कितनी मेहनत करो, लेकिन सब बेकार हो जाता है। कितनी मुश्किल से रुपए जोड़ कर रखे थे, कि इस बार लोन की ईएमआई जरूर भर दूँगा, लेकिन हाय री किस्मत! पीहू को टॉयफाइड हो गया। कुछ रुपए उसमें खर्च हो गए, फिर रिश्तेदारी-नातेदारी सब तो निभानी पड़ती ही है।
“क्या करूँ, ऐसी ज़िंदगी किस काम की ?”
“क्या हुआ ? कुछ परेशान लग रहे हो। काहे की चिंता-फिक्र में गले जा रहे हो… अपना शरीर देखो, कैसे सूखता जा रहा है। लो ठंडा पानी पो लो।” कहते हुए ग्लास पकड़ा कर पति के नजदीक लेट कर उसके पास सरक आई थी।
“मुझे बताने में काहे को हिचक रहे हो।“
“तुम मेरी तकलीफ दूर कर दोगी क्या ? कहते हुये वह पलट कर लेट गया था।
“क्यों नहीं ? मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, और पत्नी तो अर्धांगिनी होती है। तुम्हारे हर सुख-दुख की साथी हूँ।“
“रहने दो, फिजूल की बात मत करो। जब जरूरत होती है तो कोई साथ नहीं देता।“
“अरे, मैं तो तुम्हें बताना ही भूल गई थी। बैंक से नोटिस आया है। मैंने कितनी बार तुम्हें कहा था कि लोन की ईएमआई के पैसे जमा कर दो, लेकिन तुमने मुझे डाँट कर चुप करा दिया था। पत्नी की बात सुनता कौन है… इज्जत नहीं चली जाएगी।“
“बस भी करो…, वैसे ही आँखों की नींद उड़ी हुई है। तुमने अपनी बकवास शुरू कर दी।“
“४ लाख ₹ का नोटिस है। समय पर नहीं जमा हुआ तो हमारा घर नीलाम कर दिया जाएगा।
इस घर में पत्नी की सुनता कौन है। बार बार ईएमआई भरने को कहते थे, लेकिन तुम्हारे कान पर जूँ भी नहीं रेंगी।
अब भुगतो, साथ में हम सब भी भुगतेंगें।“
वह कई महीनों से घर के लोन की ईएमआई नहीं भर पा रहा था। वह भी क्या करे, पीहू की कोचिंग की भारी-भरकम फीस भरने में ही वह बरबाद हुआ जा रहा है। अपनी थोड़ी-सी पगार में वह क्या-क्या करे, वह मन में सोच रहा था…।
नोटिस की बात सुनते ही महिम पसीने से नहा उठा था और उसके हाथ-पैर ठंडे होने लगे थे।
“नोटिस देख कर हालत खराब हो गई। परेशान मत हो, मेरे अकाउंट से जमा कर दो।“
“वह तो तुम्हारे पैसे हैं, तुमने पीहू की पढ़ाई के लिए जमा किए हैं।“
“ठीक है, क्या पीहू तुम्हारी बेटी नहीं है। मैं तुम्हारी पत्नी हूँ, तो तुम्हारी तकलीफ मेरी तकलीफ नहीं हुई क्या ?”
“तुमने बड़ी मेहनत से पैसे बचा कर रखे थे, कि मैं अपने लिए सोने की चेन लूँगीं ।“
“मेरी सोने की चेन तो तुम हो, तुम परेशान रहे तो पैसा किस काम का ?”
आज उसे पत्नी की अहमियत पर बहुत प्यार आ रहा था। उसे लग रहा था कि ज़िंदगी इतनी भी कठिन नहीं है। वह पत्नी की बाँहों में लिपट कर चैन की नींद में सो गया था।