संजीव एस. आहिरे
नाशिक (महाराष्ट्र)
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पूर्वांचल पर भोर की लालिमा धूमिल हुई, तब उजियारे की नई आभा लेकर सूरज की कोर उभरने लगी है। भीषण गर्मी के दिन हैं, फिर भी सुबह की ठंडी हवा के झोंके कुछ यूँ छू रहे हैं, जिससे तन-मन प्रसन्न हुआ जा रहा है।
सामने इमली के पेड़ों में छिपकर एक भरद्वाज का जोड़ा भली भोर से ही कुछ गाए जा रहा है। पहले एक कुछ बोलता, वह जैसे ही चुप होता; दूसरा बोलने लगता। कितनी ही देर से भरद्वाजों की यह जुगलबंदी चल रही है। सुरजना के कतारबद्ध पेड़ों में सात भाइयों की एक बड़ी-सी टोली एक स्वर में गाए जा रही है। उनमें से कुछ सात भाई अचानक उड़ने लगते, दो-चार टोलियों में विभाजित हो जाते और फिर सुर मिलाकर गाने लगते। सात भाइयों के सुरों का जैसे मेला लगा हुआ है। कमाल के पंछी हैं ये सातभाई! दिनभर अथक गाते रहते, इस पेड़ से उस पेड़ फुदकते रहते। इस पृथ्वी को जैसे सुरों से पाटकर संगीतमय बनाने का उन्होंने बीड़ा उठा रखा है। सात भाइयों ने कोलाहल मचाया हुआ है और कोयलों ने अब कुहू-कुहू के तराने छेड़ दिए हैं।
पड़ोस की घनी झाड़ियों से मोरों की केकावलिया उभरने लगी है। उतने में सोनचिरैया का एक झुंड मोगरे के फूलबदन में उतरकर अदृश्य होकर चीं-चीं-चीं के स्वरों में गाने लगा है। कितने मासूम और रिमझिम बोल हैं ये!
सुरों की इन फुलझड़ियों को सुनते हुए मैं खेत की मेढ़ पर आकर खड़ा हुआ, देखा सामने नीम और अमलताश के पेड़ों पर मैनाओं ने मेला लगा रखा है और स्वर बदल बदलकर अनवरत गाने लगी है। ओह! कैसा गीत है यह मैनाओं का, उस गीत को सुनने की मैं कोशिश कर ही रहा था कि सामने से चिड़ियों का एक बड़ा झुंड आया और तेज रप्तार से ओझल भी हो गया।
मन ही मन मैं सोंचने लगा, अगर ये पंछी न होते तो कितना सूना होता गगन। अपने मासूम स्वरों से इस जमीं पर कितना संगीत भर दिया है इन निरीह पंछियों ने! मैंने महसूस किया कि हर पंछी अपनी-अपनी हैसियत से इस पृथ्वी को सुंदर बनाने में लगा है। दूसरे ही पल में विचार आया, काश! ऐसे ही हर आदमी पृथ्वी को सुंदर बनाने में अपना छोटा-छोटा योगदान देने लगे तो…।
परिचय-संजीव शंकरराव आहिरे का जन्म १५ फरवरी (१९६७) को मांजरे तहसील (मालेगांव, जिला-नाशिक) में हुआ है। महाराष्ट्र राज्य के नाशिक के गोपाल नगर में आपका वर्तमान और स्थाई बसेरा है। हिंदी, मराठी, अंग्रेजी व अहिराणी भाषा जानते हुए एम.एस-सी. (रसायनशास्त्र) एवं एम.बी.ए. (मानव संसाधन) तक शिक्षित हैं। कार्यक्षेत्र में जनसंपर्क अधिकारी (नाशिक) होकर सामाजिक गतिविधि में सिद्धी विनायक मानव कल्याण मिशन में मार्गदर्शक, संस्कार भारती में सदस्य, कुटुंब प्रबोधन गतिविधि में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ विविध विषयों पर सामाजिक व्याख्यान भी देते हैं। इनकी लेखन विधा-हिंदी और मराठी में कविता, गीत व लेख है। विभिन्न रचनाओं का समाचार पत्रों में प्रकाशन होने के साथ ही ‘वनिताओं की फरियादें’ (हिंदी पर्यावरण काव्य संग्रह), ‘सांजवात’ (मराठी काव्य संग्रह), पंचवटी के राम’ (गद्य-पद्य पुस्तक), ‘हृदयांजली ही गोदेसाठी’ (काव्य संग्रह) तथा ‘पल्लवित हुए अरमान’ (काव्य संग्रह) भी आपके नाम हैं। संजीव आहिरे को प्राप्त सम्मान-पुरस्कार में अभा निबंध स्पर्धा में प्रथम और द्वितीय पुरस्कार, ‘सांजवात’ हेतु राज्य स्तरीय पुरुषोत्तम पुरस्कार, राष्ट्रीय मेदिनी पुरस्कार (पर्यावरण मंत्रालय, भारत सरकार), राष्ट्रीय छत्रपति संभाजी साहित्य गौरव पुरस्कार (मराठी साहित्य परिषद), राष्ट्रीय शब्द सम्मान पुरस्कार (केंद्रीय सचिवालय हिंदी साहित्य परिषद), केमिकल रत्न पुरस्कार (औद्योगिक क्षेत्र) व श्रेष्ठ रचनाकार पुरस्कार (राजश्री साहित्य अकादमी) मिले हैं। आपकी विशेष उपलब्धि राष्ट्रीय मेदिनी पुरस्कार, केंद्र सरकार द्वारा विशेष सम्मान, ‘राम दर्शन’ (हिंदी महाकाव्य प्रस्तुति) के लिए महाराष्ट्र सरकार (पर्यटन मंत्रालय) द्वारा विशेष सम्मान तथा रेडियो (तरंग सांगली) पर ‘रामदर्शन’ प्रसारित होना है। प्रकृति के प्रति समाज व नयी पीढ़ी का आत्मीय भाव जगाना, पर्यावरण के प्रति जागरूक करना, हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने हेतु लेखन-व्याख्यानों से जागृति लाना, भारतीय नदियों से जनमानस का भाव पुनर्स्थापित करना, राष्ट्रीयता की मुख्य धारा बनाना और ‘रामदर्शन’ से परिवार एवं समाज को रिश्तों के प्रति जागरूक बनाना इनकी लेखनी का उद्देश्य है। पसंदीदा हिंदी लेखक प्रेमचंद जी, धर्मवीर भारती हैं तो प्रेरणापुंज स्वप्रेरणा है। श्री आहिरे का जीवन लक्ष्य हिंदी साहित्यकार के रूप में स्थापित होना, ‘रामदर्शन’ का जीवनपर्यंत लेखन तथा शिवाजी महाराज पर हिंदी महाकाव्य का निर्माण करना है।