डॉ. श्राबनी चक्रवर्ती
बिलासपुर (छतीसगढ़)
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तुम थक कर सो गए थे न,
फिर मध्य रात्रि में
उनींदी अखियों से,
क्यों झांका वॉट्सएप में!
मेरा शेर, कभी मेरी कविता
पढ़ने के लिए या फिर सिर्फ,
ये देखने कि मैंने क्या लिखा है ?
तुम जान-बूझ कर,
इसका जवाब नहीं दोगे
रात और सुबह तन्हा रहकर,
उन पंक्तियों को दुबारा पढ़कर भी
तुम खामोशी की परत चढ़ाकर,
मेरी लेखनी से अनभिज्ञ होने का भान करते हो
जिस तरह भोर होते ही तारे नभ में विलीन हो जाते हैं।
काश! तुम समझ सकते,
कि कितना दर्द होता हैं मुझे
जान कर भी तेरा अनजान बना रहना,
अरे कुछ शब्दों में पिरोकर गर
बिखेर देते अपने भावों को।
तो थोड़ा मरहम लग जाता मेरे घावों को,
तन्हाई से लिपटी हुई रातों में…॥