कुल पृष्ठ दर्शन : 123

बहन की पहचान

कुमारी ऋतंभरा
मुजफ्फरपुर (बिहार)
************************************************

झारखंड की एक छोटी-सी बस्ती में एक टूटा-फूटा घर था। उस घर में २ छोटे-छोटे बच्चे रहते थे — गगन और तावारी। ‘गगन’ छोटा भाई था, ‘तावारी’ बड़ी बहन।
  अचानक एक हादसे ने दोनों के सिर से माँ-बाप का साया छीन लिया। दोनों अनाथ हो गए।
       तावारी बचपन से ही घर-घर जाकर बर्तन माँजती, झाड़ू-पोछा करती। जो जूठा-बासी मिल जाता, उसी से भाई गगन का भी पेट भरती। बहन तो माँ का रूप होती है, इसलिए तावारी का एक ही सपना था — गगन को पढ़ाना, पर भूख और गरीबी की मार सपने कहाँ पूरे होने देती है।
    धीरे-धीरे तावारी बड़ी होने लगी। उसके शरीर की सुंदरता और जवानी की आहट अब बस्ती की औरतों की काना-फूसी का कारण बन गई थी। आते-जाते गगन सुनता — “तावारी का ब्याह कर दो, कौन जाने, क्या अनहोनी हो जाए ? बस्ती की लाज रह जाए।”
   गगन को क्या समझ, जवानी क्या होती है ? उसे तो बस तावारी की ममता मिली थी, लेकिन समाज तो समाज होता है दोस्त, उसे गरीबी से क्या वास्ता ?
   एक शाम चौराहे पर कुछ आवारा लड़के तावारी को घूर रहे थे। फटे कपड़ों के बीच से झाँकती उस मासूम खूबसूरती को गंदी नज़रें नोच रही थीं। ईश्वर की लीला भी निराली है। गरीबी में सुंदरता क्यों दे देते हो भगवान ?
उस रात गगन सो नहीं पाया। तारों को निहारते हुए सोचता रहा —”क्या शादी इसलिए होती है, समाज की गंदी नज़रों से बचने के लिए ?”
     भोर होते ही गगन सरपंच के दरवाजे पर जा पहुँचा। पैरों में गिरकर बोला — “माई-बाप, आप ही नैया पार करो। अब मेरी बहन की इज्जत आपके हाथ में है।” सरपंच ने पान थूकते हुए कहा — “हो जाएगी।” मुंशी ने कुछ रुपए थमा दिए।
    पहाड़ के उस पार गाँव में एक लड़का था, सीमेंट फैक्ट्री में पत्थर ढोता था। बड़ी धूमधाम से तावारी की डोली उठी। बस्ती देखती रह गई। बहन का घर बस गया, गगन का सीना चौड़ा हो गया। तावारी ने भी भाई का ब्याह करवा दिया, पर किस्मत को ये सुख रास न आया। एक दिन खबर आई — “तावारी की माँग उजड़ गई।” गगन पर तो मानो पहाड़ टूट पड़ा। तावारी के पेट में बच्चा था। गगन उसे अपने घर ले आया, मगर गगन की पत्नी को ननद का आना ज़हर लगा। दिन-रात ताने, गाली-गलौज…। बेबस भाई को तड़पता देख एक रात तावारी चुपचाप घर छोड़ गई। वापस ससुराल जाकर पहाड़ पर पत्थर ढोने लगी। पेट की आग बुझानी थी। इसलिए गरीब को अपनी भूख के आगे पेट का बच्चा भी नहीं दिखता।
   फिर वो मनहूस दिन आया। पहाड़ चढ़ते वक्त तावारी का पैर फिसला और पेट में पल रहा बच्चा वहीं खत्म हो गया। कुछ दिन बीमार रहकर तावारी ने भी दम तोड़ दिया। गगन ने बिलखते हुए बहन को दफना दिया।
   कुछ दिन बाद तावारी के सामान में एक बैंक पास-बुक मिली। २० हजार ₹ जमा थे-तावारी की ज़िंदगी भर की कमाई। गगन भागा-भागा बैंक पहुँचा। मैनेजर बोला— “तावारी जी को साथ लेकर आइए। पैसा खाताधारक को ही मिलेगा।”
    हाय रे गरीबी! क्या नीली स्याही का महत्व एक भाई की भावनाओं से बढ़कर है ? सारे नियम-कानून गरीबों के लिए ही बने हैं। अमीर होता तो सारे दरवाज़े खुल जाते…।
घर की किच-किच और बैंक के कागज़ी कानून से तंग आकर गगन ने न आव देखा, न ताव। कुदाल उठाई और बहन की कब्र खोद डाली। कंकाल को कंधे पर रखा और बैंक पहुँच गया।
काँपते हाथों से बहन की उंगली पकड़ी और स्याही-पैड पर रख दी। पूरा बैंक सन्न रह गया। गगन चीख पड़ा — “मैनेजर बाबू, यही मेरी बहन तावारी है। आज मुझे पैसे दे दो।”
   मैनेजर का कलेजा काँप गया। उसने चुपचाप २० हजार ₹ गगन के हाथ में रख दिए। गगन ने पैसों को फटे गमछे में बाँधा, बहन के कंकाल को फिर कंधे पर रखा और चुपचाप घर की तरफ चल पड़ा।
न आँख में आँसू थे, न चेहरे पर शिकन। बस एक सवाल था—यह सब गरीबों का मज़ाक है या फिर गरीबों पर ही सिस्टम का प्रहार है ?
गरीब मज़दूर हो सकता है, गरीब मजबूर हो सकता है — पर गरीब कमज़ोर नहीं हो सकता। बस यही सत्य है। यही तावारी की पहचान है। यही गगन की जीत है।