ममता सिंह
धनबाद (झारखंड)
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कितना अच्छा कितना प्यारा परिवार हमारा,
सबसे प्यारा, सबसे अच्छा है परिवार न्यारा।
इसमें तो बसता है, प्यारा संसार हमारा,
सबसे प्यारा, सबसे दुलारा परिवार सहारा।
सबसे छोटा होता है, सबका प्यारा दुलारा,
सबकी आँखों का वो, तो होता है इक तारा।
सबसे बड़ा होता, हर किसी की छत्र-छाया है,
परिवार में रीढ़ की, वो हड्डी माना जाता है।
काम करके दिनभर का, थका-हारा आता है,
घर में आकर उसका, सारा दर्द मिट जाता है।
परिवार में खुशियाँ, मिलती रहती है सबको,
जब सुख-दु:ख में साथ, निभाते हैं सब तो।
जिस किसी का नहीं, होता है जब परिवार,
तरसता है वो अब तो, तमाम उम्र बेहिसाब।
‘छोटा परिवार सुखी परिवार’ का है नारा,
तोड़ डाला सुख की, सभी कुंजी का ताला।
परिवार में मिलता, सभी से संस्कार प्यारा,
हँसता-खेलता परिवार, होता सुखी परिवार।
साथ में बैठ मिलकर, जब सब बातें करते,
दादा-दादी, मम्मा-पापा, भाई-बहन चिढ़ाते।
सभी सदस्यों का अपना, एक दायरा होता है,
एक-दूसरे से मिलकर, सुख-दु:ख बांटना होता है।
अब वो दौर हुआ खत्म, पश्चिमी सभ्यता की नकल,
बचा-खुचा पूरा कर दिया, मोबाइल की व्यस्तता सहज।
कहने को तो सभी, अपने-अपने घर में होते हैं,
पर सबके हाथों में, मोबाइल फोन होते हैं।
जरूरत पड़ने पर एक ही, घर में फोन से बातें होती हैं,
और अगर जरूरत ना हुई, तो सभी अनजाने बने होते हैं।
परिवार को टूटने से बचाना है, तो प्यार को जगाना होगा,
आपस में मिल बातें करना, मोबाइल से दायरा बनाना होगा।
छोटे सदस्यों से प्यार, बड़ों का सम्मान करना होगा,
सभी अपना फर्ज निभाएं तो, भगवान को भी आना होगा।
अगर एक बार टूटा परिवार, तो दुश्मन फायदा उठाएगा।
राह भटक जाने पर पंछी, दुबारा घोंसला बन नहीं पाएगा॥