पद्मा अग्रवाल
बैंगलोर (कर्नाटक)
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हम सबके लिए प्रेरणा स्त्रोत एवं जाना-पहचाना नाम है अरुणिमा सिन्हा, जिन्होंने अपनी अदम्य इच्छाशक्ति और साहस द्वारा असंभव को संभव करके दिखा दिया, और स्वर्ण अक्षरों मे अपने नाम को इतिहास में दर्ज करा दिया।
अरुणिमा का जन्म आम्बेडकर नगर के शहजादपुर इलाके के पंडाटोला मोहल्ले के साधारण परिवार में हुआ था। वह माता-पिता के साथ एक छोटे से मकान में रहती थीं, परंतु बचपन से कुछ अच्छा करने का जज्बा था। वह बॉलीबाल खेलती थीं। उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित किया था कि वह भारतीय बॉलीबाल टीम को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलवा कर रहेंगीं और उसके लिए प्रयासरत भी थीं। इसी जुनून के साथ वह कक्षा ६ में पढाई भी कर रहीं थीं ।
समय गुजरता गया और उनका चयन बॉलीबाल की राष्ट्रीय टीम में हो गया। सब कुछ सामान्य रूप से चल रहा था, तभी उनके साथ एक ऐसी घटना घटी; जिसने उनके जीवन की दिशा ही बदल कर रख दी, परंतु देखा जाए तो इसी घटना के कारण उन्होंने नए कीर्तिमान स्थापित किए।
यह घटना २०१1 की है, जब अरुणिमा ट्रेन के जनरल कोच में यात्रा कर रहीं थीं। यात्रा के दौरान कुछ बदमाश ट्रेन में दाखिल हो गए और यात्रियों से लूट-पाट करना शुरू कर दिया। एक महिला के गले से सोने की चेन खींचने की सूचना जब अरुणिमा को मिली, तो उन्होंने बदमाशों का विरोध करने की कोशिश की। बहादुरी से बदमाशों के साथ लोहा लिया, जो बदमाशों को बहुत नागवार गुजरा और उनने बदला लेने के लिए अरुणिमा
को उठाकर ट्रेन से बाहर फेंक दिया। अरुणिमा को कूल्हे में गंभीर चोट आई, साथ में उनका बायाँ पैर भी पटरियों के बीच आ गया और बुरी तरह से जख्मी हो गया।
अरुणिमा रातभर उस रेल की पटरियों पर दर्द से चीखती-चिल्लाती और तड़पती रही। सुबह वहाँ नजदीक में रहने वाले लोगों को इस दुर्घटना की जानकारी हुई, तो उन्हें लेकर अस्पताल गए। चोट की गंभीरता को देखते हुए उन्हें तुरंत हवाईजहाज से दिल्ली ले जाया गया और वहाँ एम्स में भर्ती करवाया गया। वहाँ डॉक्टरों को उनकी जान बचाने के लिए बायाँ पैर घुटने से नीचे काटना पड़ा। अरुणिमा लगभग ४ महीने तक अपनी ज़िंदगी और मौत से लड़ती रही। जीवन की इस जंग में अरुणिमा की जिजीविषा ने उन्हें जीत दिलाई। फिर डॉक्टरों ने उनके पैर को कृत्रिम पैर के सहारे जोड़ दिया, जिससे अब वह चल सकती थीं।
लोग अरुणिमा को देखने हॉस्पिटल पहुंचने लगे। परिवार वालों और रिश्तेदारों की निगाह में अब वह कमजोर और विकलांग बन चुकी थीं। लोग अरुणिमा को दया की दृष्टि से देखते, सबको उनकी हालत पर दया आती, परंतु अरुणिमा लोगों द्वारा दिखाई जाने वाली दया की दृष्टि से मुक्ति चाहतीं थी। उन्होंने अपने मन में संकल्प किया, कि वह कोई ऐसा काम करेगीं, जिससे लोग उनकी ओर दया की दृष्टि से देखना छोड़ दें।
डॉक्टर भी अरुणिमा को आराम करने की सलाह दे रहे थे, लेकिन उन्होंने अपने हौसले में कोई कमी नहीं आने दी। वह किसी के सामने अपने को बेबस और लाचार घोषित नहीं करना चाहतीं थीं।
अरुणिमा जब इलाज के बाद अपने घर लौट कर आईं तो उन्होंने अपने कृत्रिम पैर की सहायता से माउंट एवरेस्ट पर विजय पाने का निश्चय किया। अपनी य़ोजना के अनुसार उन्होंने उत्तर काशी के नेहरू माउंटेनियरिंग संस्थान में दाखिला लिया। भारत की पहली महिला एवरेस्ट विजेता सुश्री बछेंद्री पाल के मार्गदर्शन में कठोर शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक अभ्यास के बाद वह सबसे पहले लद्दाख में २१, ११० फुट की ऊँचाई पर चढ़ने में सफल हुईं। इस पहली सफलता से अरुणिमा का उत्साह बढ़ गया। टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन की व्यवस्था और शेरपा तेनसिंह की सहायता से १९ मई २०१३ को वह अवसर आ ही गया, जिसका अरुणिमा को लंबे समय से इंतजार था। सोमवार की शाम लगभग ६ बजे वह अपने कैंप से आगे बढ़ी। हड्डियों को कंपा देने वाली बर्फ, ठंडी हवा और अंधेरे को चीरती हुई अरुणिमा लगातार ऊपर चढ़ती गईं।मंगलवार की सुबह १९ बजकर ५५ मिनट पर वह एवरेस्ट की चोटी पर पहुंच गईं। काठमांडू से प्रारंभ हुई इस यात्रा में उन्हें ५२ दिन लगे। इस सफलता पर बछेंद्री पाल ने उन्हें बधाई दी। दिल्ली के जिस चिकित्सक ने उनका इलाज किया था, इस उपलब्धि को सुन कर आश्चर्य से स्तब्ध रह गए।
अरुणिमा यहीं नहीं रुकीं, उन्होंने अभावों के कारण निराश लोगों को प्रेरणा देने और उत्साह जगाने के लिए दुनिया के सातों महाद्वीपों की सबसे ऊँची चोटियों पर चढ़ने का निश्चय किया। और यह उन्होंने करके भी दिखाया है। अफ्रीका की किलिमंजारो और योरोप की एलब्रुस चोटी पर वह भारत के तिरंगे को ल़हराने में कामयाब हो चुकी हैं।
उन्होंने केवल पर्वतारोहण में ही नहीं, वरन् ब्लेड रनिंग में भी अपनी धाक जमाई है। चेन्नई में हुए ओपन नेशनल गेम्स (पैरा) में उन्होंने १०० मीटर की दौड़ में स्वर्ण पदक जीता। आज वह उन्नाव के बेथर गाँव में ‘शहीद चंद्रशेखर आजाद खेल अकादमी‘और ‘प्रोस्थेटिक लिंब रिसर्च सेंटर’ के रूप में अपने सपने को आकार देने मे जुटी हुई है।
यदि विकलांग होने के बाद वह हार मान कर अपने घर में रोती रहती, तो परिवार के लिए बोझ बन कर रह जातीं और सारा जीवन दूसरों के सहारे गुजारना पड़ता, परंतु बुलंद हौसले, साहस और आत्मविश्वास के कारण उन्होंने दुनिया को दिखा दिया कि कोई भी व्यक्ति शरीर से विकलांग नहीं होता, वरन् मानसिक रूप से विकलांग होता है। वह कहती हैं,-
अभी तो इस बाज की उड़ान बाकी है,
अभी तो इस परिंदे की उड़ान बाकी है।
अभी-अभी तो मैंने लांघा है समंदरों को,
अभी तो पूरा आसमान बाकी है।
किसी ने सच ही कहा है, कि उड़ान पंखों से नहीं, जज्बे से भरी जाती है…।